"मानव मूल्यों से ही नैतिकता आवेगी"
ये विचार मेरे अपने विचार हैं और मेरी भावनाओँ से उपजे हैं। जरूरी नहीं कि ये नैतिक मूल्यों पर फिट हों पर ये मानव मूल्यों के आधारगत तो हैं ही। मैं यह भी मानता हूँ कि मानव मूल्यों की राह चल कर नैतिक मूल्यों को प्राप्त किया जाना चाहिए। मानव मूल्य हमारी सांस्कृतिक अवचेतना के मुख्य सिद्धान्त "वसुधैव कुटुम्बकम्" की नींव पर रखे होने चाहिए तो फिर नैतिक मूल्य परिशुद्ध होंगे ही। आज स्वतंत्रता के मायने निरंकुशता की कडुआहट से क्यों भर गए हैं? ट्रेन के टॉयलट में आइने पर लिखा था " रेलवे आपकी संपत्ति है, इसका ध्यान रखें।" इस तरह के एक स्वतंत्र व्यक्ति ने उसे उखाड़ लिया और घर ले गया; कहने लगा कि मैंने अपने नैतिक मूल्य का ख्याल रखा है, "मेरा था इसे मेरे घर ले आया अब मैं इसका ख़्याल रखूँगा।" शायद बहुतेरे लोग अपने नैतिक मूल्यों का निर्वहन ऐसे ही कर रहे हैं। मानवीय मूल्यों की लाश पर पैर रख कर लोक कल्याण की डगर पर जाना एक दिन विध्वंस ही लाएगा।
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गुजिश्ता हफ्ते में हुई घटनाओं से क्या हमें यह नहीं लगता कि शायद कुछ तो गड़बड़ है।
एक खुले मस्तिष्क में जो बेबाक चिन्तन आया है वह...
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हमें सामाजिक सुरक्षा, अपने हितों पर अतिक्रमण और सामाजिक शांति के प्रति जागृत रहना होगा। कभी कभी हमारी आँखों पर नीले काले पीले चश्मे चढ़ा दिए जाते हैं। सूखी घास हमें हरी लगती है, बवंडर भरा आसमान नीला लगता है, दूध काला लगने लगता है। मीडिया की परोसगारी पर कई प्रश्न चिन्ह लगे हैं। हम वह खाते हैं जो हमें परोस दिया जाता है। अब हमारी डाइनिंग टेबल पर खाना रसोई से कम फास्ट फूट के पैकेटों के माध्यम से अधिक आता है। असलियत पर इतने मुलम्मे चढ़कर आते हैं कि कद्दू का केचप टमाटर का बता कर खिलाते हैं और तब भी हम चटकारे ले कर खाते हैं। कहीं शेर की खाल में भेडिये डराते हैं तो कहीं शेर भेड़िये की खाल ओढ़ कर कन्फ्यूज कर रहे है।
हमें रंगमंच पर चल रहे दृष्य तो दिखाई देते हैं पर नेपथ्य में उसकी तैयारी, बाजीगरी, सूत्रधार अौर बिना मुखौटे-मेकअप के वे असली लोग नहीं दिखाई देते हैं। ये मुखौटे अौर सूत्रधार भी किसी और की कहानी को पर्दे पर जीते है या कहें कि उसे रूपायित करते है। दर्शक की पहुँच नेपथ्य की उस पार नहीं है। दर्शक तो भाव विभोर हो कर साथ साथ गाने लगता है...नंद घर आनन्द भयो जै कन्हैया लाल की। परीक्षा में बैठे पप्पू को लिखी लिखाई कॉपी कहीं से मिल गई, परीक्षक ने जाँची तो कहना उसे यही पड़ेगा कि पप्पू पास हो गया।
कुछ चतुर लोग यह देखते ही रहते हैं कि चूल्हा कहाँ जल रहा है वहाँ अपना आटा लेकर रोटी सेंक लाते हैं। वहीं कुछ लोग ऐसे भी होते हैं कि आपके गरम दूध में पड़ी मलाई लेकर भाग जाते हैं।
सिक्के को दोनो तरफ से देखना जरूरी है। आइने के सामने खड़े हो कर देखो दाहिनी तरफ की गई माँग बाईं ओर दिखेगी। यह भी सच है अौर वह भी सच है। क्या हम अपनी आँख से धोखा नहीं खाते।
स्वतंत्रता हमें मिली पर हमें स्वाधीन भी होना जरूरी है। स्वतंत्रता की मशीन के सब पुर्जे हमारे हैं पर इसकी मोटर की पावर अौर मशीन का रिमोट किनके हाथों में है इस बात से बेखबर नहीं रहना चाहिए।
उस रोशनी की हमें जरूरत नहीं जो हमारे बसेरों का जला कर मिले। जलती बसों के उजाले में हम क्या देखना चाहते हैं? ऐसे सिग्नल मेन की हमें जरूरत नहीं जो दौड़ती ट्रेन को डेड एण्ड की ओर मोड़ दे। एक ट्रक में भरे केलों को बर्बाद करने के लिये सौ ग्राम इलायची काफी है। कौन है वो जो हमारे शांतिवन में दावानल लेकर आ गए हैं। शायद वे भी मानव बम बन कर खड़े हो गए हैं। जो भी हो; शान्ति वन को शान्ति घाट होने से बचाना चाहिए।
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निवेदक
रामनारायण सोनी
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