.अन्तर्यात्रा ३
खुद को देखने के दो तरीके हैं- 1खुली आँख से दर्पण में अौर 2. आँख मूँद कर अपने भीतर में देख कर। मजे की बात यह है कि तुम भीतर और बाहर अलग अलग दिखाई देते हो, भीतर कुछ और, बाहर कुछ अौर। जितने अलग अलग उतने अशान्त, असहज, कृत्रिम अौर परेशान। भीतर जैसे हो वह मौलिक हो लेकिन बाहर एक मुखौटा लगाए हो। झ्स मुखौटे के पीछे तुम भी अवास्तविक हो गए हो। हाँ, इसीलिये तुम दोहरा जीवन जी रहे हो। सब के सामने मुखौटे वाला और अपने लिए अधूरा-अधूरा सा। इस गफलत में तुम अपने खुद के मूल को भूल कर बाहर-बाहर ही जिये जा रहे हो। तुम सागर हो लहरों से उफनता अशान्त बाहरी स्वरूप तुम्हारा मूल स्वरूप नहीं है वह बाहर दिखाई देने वाला मुखौटा है। इन लहरों के तले के सागर, असीम सागर, शान्त सागर, गहन-गंभीर सागर तुम हो। बाहर लहरों का, थपेड़ों का आवरण तुम्हें अपने भीतर नहीं देखने दे रहा है। थोड़ा भीतर उतरो।
सच मानो बाहर का शोर थमा नहीं है, थपेड़े बन्द नहीं हुए हैं, वे वहीं के वहीं है, इस अन्तर्यात्रा के कारण तुम भीतर को उन्मुख हो गए हो और एक अद्भुत शान्ति, नीरवता, एकात्मकता को प्राप्त हो गए हो। मुखौटे वहीं पड़े रह गए हैं और तुम स्वयं से मिल गए हो।
निवेदक
रामनारायण सोनी
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