Sunday, June 4, 2017

स्वप्न अौर जाग्रत के मन अौर चित्त वही है

स्वप्न अौर जाग्रत के मन अौर चित्त वही है।

यथा स्वप्ने द्वयाभासं स्पन्दते मायया मनः । 
तथा जाग्रद्द्वयाभासं स्पन्दते मायया मनः ॥ ३/२९ ॥
जिस प्रकार स्वप्नकाल में मन माया से ही द्वैताभास रूप से स्फुरित होता है उसी प्रकार जाग्रत काल में भी वह माया से ही द्वैताभास रूप से स्फुरित होता है।

अद्वयं च द्वयाभासं मनः स्वप्ने न संशयः । 
अद्वयं च द्वयाभासं तथा जाग्रन्न संशयः ॥ ३/३० ॥
इसमें संदेह नहीं कि स्वप्नावस्था में अद्वय मन ही द्वैत रूप से भासने वाला है इसी प्रकार जागृत काल में भी निःसंदेह अद्वय मन ही द्वैत रुप से भासता है।

हम सोते हैं तो हमें सपने आते हैं। कभी सपने याद रहते हैं कभी याद नहीं रहते। कभी सपने आधे अधूरे याद रहते हैं तो कुछ लोग कहते हैं कि उन्हें सपने आते ही नहीं है। कुछ बातें स्वप्न के विषय में जिज्ञासा पूर्ण हैं-
१, जब हम जाग रहे होते है उस समय हम सपने नहीं देखते। हमारा मन अपने आस पास की बातों में या कल्पना करने में व्यस्त रहता है।
२, जब हम सोते हैं तब या तो स्वप्न देखते हैं या स्वप्न रहित निद्रा में रहते हैं। स्वप्न मन देखता है और ठीक वैसा अनुभव करता है जैसा वह जागते वक्त स्थिति का अनुभव करता है।
जब जागते हैं तब स्वप्न नहीं आते। नींद अथात् निद्रा में ही स्वप्न आते हैं। प्रश्न उठता है कि जब हम सो जाते है तब हमारी इन्द्रियाँ और मन सभी निश्चेष्ट रहते हैं फिर कौन है जो स्वप्न देखता भी है और याद रखता भी है। जागने पर हमें वापस कौन बताता है? और किसको बताता है। जब हम सोये अौर मन भी सोया लग रहा है ऐसे में क्या कोई दूस्सा मन उसे देखता है क्योंकि जागते में जिस मन से सब कुछ अनुभूत हो रहा था वह तो सोया हुआ जान पड़ता है। हमें निश्चित ही यह लगता है कि सोते समय का और जागते समय का मन अलग अलग है लेकिन यह मात्र आभास है। मन ने स्वप्न में कुछ देखा और फिर जब जागे तो सोते हुए में सपने में देखने वाले मन ने जागते समय वह जो कुछ देखा वह बताने लगता है। हमें इस स्थिति में फिर लगता है कि सोते समय वाला मन अलग था। अर्थात् सोते समय और जागते समय, दोनों बार, हमें मन अलग अलग प्रतीत होता है। वास्तविकता यह है अन्तःकरण का यह प्रभाग मन केवल एक है पर माया के प्रभाव से दो अलग अलग प्रतीत होता है। वास्तव में सपने में कार्यशील और जागते में कार्यशील मन एक ही है।
निद्रा के समय भी वह शक्ति विद्यमान रहती है जिसे सोने का अनुभव होता है, वह शक्ति ही दृष्टा की दृष्टि है जिसका कभी नाश नहीं होता। इस तथ्य को बृहदारण्यक श्रुति४/३/२३-३० तक के मंत्रों द्वारा स्पष्ट किया गया है —पश्यन् वै तत्र न पश्यति, जिघ्रन्, रसयन्, वदन्, श्रण्वन्, मन्वन्, स्पर्शन् विजानन् — वै न पश्यति, न जिघ्रति, न रसयते,न वदति, न श्रृणोति, न मनुते, न स्पृशति, न विजानाति नहि दृषटिविलेपे भवति अविनाशित्वात् – न तद्द्वितीयमस्तिततोsन्यत्विभक्त यत् पश्येत् –इत्यादि–
अर्थात् उस निद्रावस्था में अन्य कोई न विद्यमान न रहने से प्राणी देखता हुवा, सूंघता हुवा, चखता हुवा, बोलता  हुवा, सुनता हुवा, मनन करता हुवा, स्पर्श करता हुवा और जानता हुवा भी नहीं देखता, नहीं सूँघता, नहीं चखता, नहीं बोलता, नहीं सुनता, नहीं स्पर्श करता, तथा नहीं जानता है।
तात्पर्य यह है कि नींद में यद्यपि चैतन्यता बनी रहने के कारण इन्द्रियों व मन की समस्त क्रियाओं की वास्तव में विद्यमानता रहते हुवे भी बाहरी उपकरणों (इन्द्रियों) की क्रिया न होने के कारण चैतन्यता विलुप्त हुई सी जान पङती है परन्तु वास्तव में वह दृष्टा की दृष्टि हमेशा बनी रहती है; उसका कभी लोप नहीं होता है।
जिस प्रकार जलते हुए दीपक से उसकी नैसर्गिक उष्णता अलग नहीं की जा सकती, उसी प्रकार चेतन दृष्टा स्वयम् ज्योति होने से उसकी चैतन्य दृष्टि उससे अभिन्न है तथा आत्मा चैतन्य नित्य होने से उसकी दृष्टि भी नित्य रहती है। यही प्रतीत सत्य जान पड़ती है ठीक वैसी ही जैसी जाग्रत में लगती है।

इसी प्रकार चित्त की भी स्थिति है। हम स्वप्न में अनेक प्रकार के दृश्य, देखते है, अनेक लोगों से मिलते है व स्वप्न में ही कई प्रकार की कल्पनाएँ भी करता है। यहाँ-वहाँ घूमता है परन्तु न तो उस समय उसके देखे दृश्य ही वास्तविक होते है और न ही उसके स्वयं के सिवाय अन्य कोई व्यक्ति ही होता है, न ही विचरण किये स्थान ही सत्य होते हैं। उस समय केवल मात्र उसका चित्त व चित्त की स्पन्दना ही नाना रूपों में भासती है। अर्थात् उसकी चित्त की स्फुरणा एकमात्र होते हुवे भी कोई और चित्त की उपलब्धता भासती है जो जागने पर मिथ्या मालूम सिद्ध हो जाती है। जाग्रत अवस्था में भी मानव चित्त से ही अनेक दृश्य देखता है, संवाद करता है। यहाँ वहाँ जाकर कई स्थान देखता है। इस जाग्रत अवस्था में भी वही चित्त व वही चित्त की स्फुरण के माध्यम से ही सब अनुभव प्राप्त करता है। स्वप्न तथा जाग्रत; दोनों अवस्थाओं में अनुभव करने वाला चित्त एक ही होता है।

रामनारायण सोनी

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