Friday, June 2, 2017

हम सब कौन हैं?


    हम सब कौन हैं?
हमारी जीवन यात्रा देह से शुरू होती है और देह पर ही समाप्त हो जाती है। हम जानते हैं कि एक फुट भर का आदमी; पाँच सात पौंड का आदमी अपने शरीर को पालते - पोसते जीवन भर उसके लिये करता ही रहता है और पार्थिव से चल कर वापस पार्थिव तक पहुँच जाता है। यदि यह केवल ऐसा ही होता तो सब के सब एक से ही होते। हम सब एक दूसरे से नितान्त अलग क्यों हैं? हम सब में कुछ कुछ मिलता जुलता है और कुछ कुछ एक दम अलग। जो मिलता जुलता है वह है- शरीर सप्त धातुओं से मिल कर बना है। सामान्यतः शरीर के अवयव जो दिखाई देते हैं; जैसे आँख, नाक, कान, हाथ,पैर आदि सबके हैं। सब  मनुष्योंमें काम करने खाने पीने सोने जागने की, व्यवहार करने की क्षमता होती है। अन्तर केवल मात्रा, गुणवत्ता, शक्ति आदि का होता है।
वेदान्त इसे व्यवस्थित रूप से पारिभाषित करता है। सबमें स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर आदि; ज्ञानेन्द्रियाँ, कर्मेन्द्रियाँ और अन्तःकरण आदि तात्विक रूप से मौजूद है। सभी लोग जन्मते हैं और अन्त में सब अवसान को उपलब्ध हो जाते हैं। श्रीमद्भगवद्गीता में ऐसे २४ तत्व जड़ अर्थात् बेजान बताए हैं। ये सभी एक कम्पलीट मशीन की तरह असेम्बल्ड हैं और बस पाॅवर मिलते ही यह मशीन अपने कार्य करने में सक्षम हो जाएगी। अभी यह असेम्बली पार्थिव ही है। जन्मते समय छोटी थी और क्रमशः कम ज्यादा होती रहती है। केवल एक तत्व "चेतन" है जिससे यह जीवित है। पार्थिव में यही संयुक्त होता है और अन्त में जीवात्मा विलग हो जाता है। शरीर अवस्थाओं से गुजरता है लेकिन यह चेतन अविच्छिन्न है, अपरिवर्तनीय है, अखण्ड है, अतुल्य है, उसके जैसा केवल वही है। चेतना उसका ही प्रभाव है, चेतना उसके कारण ही है, हम उसे ही जीवन तत्व कहते हैं। वही परमात्म सत्ता मुझमें है, तुम में है, उन में है, सब में हैं। सब के सब अपने आप में अलग भले ही दीख रहे हो पर अगर सब में तात्विक रूप से कॉमन कुछ है तो केवल वह आत्मा है। आत्मा ही ब्रह्म है। ब्रह्म है वही सत्य है, वही नित्य है।
उपद्रष्टानुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः ।
परमात्मेति चाप्युक्तो देहेऽस्मिन्पुरुषः परः॥२२॥
इस देह में स्थित आत्मा वास्तव में परमात्मा ही है । वही साक्षी होने से उपद्रष्टा और यथार्थ सम्मति देनेवाला होने से अनुमन्ता, सबका धारण पोषण करनेवाला होने से भर्ता, जीव रुप से भोक्ता, ब्रह्मा आदि का स्वामी होने से महेश्वर और शुद्ध सच्चिदानन्दघन होने से परमात्मा कहा गया है ।
जगत अथात् इस सृष्टि के पू;र्व भी वही था, अभी वर्तमान है, सदैव वही रहेगा भी। वह इन तीनों कालों के परे भी है। काल से अबाधित है।
ॐ इत्येतदक्षरमिदꣳ सर्वं तस्योपव्याख्यानं भूतं भवद् भविष्यदिति सर्वमोङ्कार एव यच्चान्यत् त्रिकालातीतं तदप्योङ्कार एव ॥ १॥
सर्वं ह्येतद् ब्रह्मायमात्मा ब्रह्म सोऽयमात्मा चतुष्पात् ॥ माण्डूक्य उपनिषद्/२॥
“अहम आत्मा गुडाकेश सर्व भूताशय स्थितः ” अर्थात् ; हे अर्जुन ! मैं सभी प्राणियों में स्थित आत्मा हूँ। आत्मा ही परमात्मा है ,यह भगवान का उपदेश है। आत्मा और परमात्मा दो अलग-अलग सत्ता नहीं है। यदि तुम “आत्मस्मरण ” रखते हैं ,तो सभी के अंदर “एक” परमात्मा की अनुभूति होगी ।एकत्व की अनुभूति होगी।
वास्तव में तो तुम ही ब्रह्म हो। तुम्हारा जो नाम है वह इस शरीर की संज्ञा है। जो तुम असल में हो वह अनाम ही हो। आत्मा अमूर्त है। आत्मा ब्रह्म है। अद्वैत है। इसलिये तात्विक रूप से सब के सब अभिन्न है।
“अयं आत्मा ब्रह्म ” -यह आत्मा ही परमात्मा है।।उपनिषद्।।
"ज्ञानात् एव तू कैवल्यं" इस बात को समझ लेना कैवल्य का जान लेना है और
ही तुरीय है, यही परमात्म सत्ता का बोध है।



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