😔 अन्तर्यात्रा 😔
आँख खुली है तो जगत दिखता है, बन्द करें तो दिखना बन्द हो जाता है। पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ जगत की ओर होती है तो वे सब सूचनाएँ भीतर की ओर भेजती ही रहती हैं; मन उसे पढ़ता रहता है फिर उसे जो करना है करता रहता है। न चाहे तो सूचनाएँ द्वार पर अटकी रह जाती हैं। भीतर जाएँगी तो प्रभाव होगा अन्यथा कुछ भी होता रहे कुछ फर्क नहीं पड़ता। उबलता हुआ पानी थर्मस फ्लास्क में भर कर फ्रिज में रख दें तो बाहर ठंडक होगी परन्तु फ्लास्क के भीतर गर्मी बनी रहेगी क्योंकि बाहर से आने वाली ठंडक में अवरोध उत्पन्न हो गया।
हमारे शरीर के दो हिस्से किए जाएँ जिसमें से एक हो बहिःकरण और दूसरा अन्तःकरण। बहिःकरण है हमारा हाड़-मांस का स्थूल शरीर, समस्त इन्द्रियाँ, प्राण आदि तथा अन्तःकरण में मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार। अन्तःकरण और बहिःकरण ओत-प्रोत है इन्हें अलग अलग नहीं किया जा सकता। फिर भी बहिर्जगत और अन्तर्जगत को अपने-अपने कर्मक्षेत्रों में निरोध किया जा सकता है अर्थात् दोनों के अपने अपने क्षेत्र में चल रहे घटनाक्रमों को एक दूसरे से प्रभावित हुए बिना उन्हें अपनी अपनी जगह बरकरार रहने दिया जा सकता है। जैसे फ्रिज की ठण्डक फ्रिज में रहे और थर्मस फ्लास्क की भीतरी ऊष्मा भीतर रहे। इसमें फ्लास्क का ढक्कन अत्यन्त महत्वपूर्ण बैरियर है। ठीक इसी तरह शरीर में यह स्थान है मन का द्वार है। बहिःकरण में चल रहे आवगों, संवेगों, सुखों, दुःखों और संवेदनाओं को अन्तःकरण तक पहुंचने से रोक देना हँसी खेल नहीं है।
श्रीमद्भगवद्गीता में बताए गए समत्व योग से यह सिद्ध हो सकता है।
योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनंजय ।
सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ॥४८॥
हे धनञ्जय ! तू आसक्तिको त्यागकर तथा सिद्धि और असिद्दिमें समान बुद्धिवाला होकर, योगमें स्थित हुआ कर्तव्यकर्मोंको कर; यही समत्व योग कहलाता है ।। ४।।
आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन।
सुखं वा यदि वा दुःखं सः योगी परमो मतः।।६/३२।।
हे अर्जुन जो पुरुष अपने शरीरकी उपमासे सब जगह अपनेको समान देखता है और सुख अथवा दुःखको भी समान देखता है वह परम योगी माना गया है।
हम यह नहीं जानते कि बहिःकरण से शक्तिशाली अन्तःकरण होता है। हमारा बाहर सब कुछ भीतर के संकल्पों और निर्देशों से ही क्रियान्वयित होता है। अर्जुन ने निश्चय किया कि उसे युद्ध करना है और वह युद्ध भूमि में उपस्थित हो गया; यह भीतर का निर्णय था। सेना में दोनों ओर अपने लोग ही मरने-मारने के लिए आमने सामने खड़े हो गए यह देख कर उसे भीतर ही ग्लानि हुई और वह कहने लगा कि मुझे युद्ध नहीं करना; यह भीउसके अन्तःकरण से ही निर्णय आया था। और अन्त में वह गीतोपदेश सुनता है और कहता है स्मृतिर्लब्धा, गतसंदेहाः यह भी भीतर ही भीतर घटित हुआ था। अर्थात् जो कुछ बाहर हुआ वह सब अन्दर ही अन्दर, अन्तर्जगत में घटित संयोजनों का ही परिणाम था। युद्ध जैसे कठोरतम निर्णय बाहर के निर्णय नहीं थे। वे सब अन्तर्जगत के उद्वेलन और परिणाम थे।
"मन के द्वार को यदि सम्यक् रूप से रेगयूलेट किया जा सके तो विलक्षण उपलब्धियाँ हो सकती हैं।"
अनवरत.......
निवेदक
रामनारायण सोनी
No comments:
Post a Comment