Thursday, June 22, 2017

आते जाते पल

पंख लिए पल

जो पल आने वाला है और जो पल सामने खड़ा है दोनो बहुत छोटे छोटे है। जब ये दोनों ही गुजर जाएँगे तो बहुत बड़े हो जाएँगे। शायद इतने बड़े कि इनके बोझ तले जिन्दगी फिर अपने पैरों पर उस तरह खड़ी न होने पाए। शायद इसे तब बैसाखियों की जरूरत लगेगी। पता नहीं था कि गुलाब के वे सुर्ख फूल कुछ पल महक कर फिर सूख जाएँगे। इसीलए कि फूल असली थे। नकली होते तो नहीं सूखते। गोद में रखा सिर उस अहसास को पिंजरों में पाल कर देखता रहता है। गहराते कुंतलों में निरखते चाँद से अकसर खेलता रहता है। यादों के बिछौनो पर मन लोट लगाता है, करवटें लेता है। तपती धूप को भी दुशाला बना कर ओढ़ता है। आज भी बरगद के तले गहन शान्त खड़े शिवालय की उन घंटियों की ध्वनियाँ कैसे तैरती हुई आ जाती है। आम की घनी छाँव में अपने साए खो जाते है। कोयलें एक साथ कूक उठती हैं। इन अधरों पर पोरों की छुअन आज भी जिन्दा है। आज गुजिस्ता पलों की तरह छायाएँ भी बड़ी हो गई हैं। हम उसे भुला पाते नहीं क्योंकि इनके साये में याद के रुपहले पल सोए पड़े हैं। ये खड़े हो गए तो हम जी नहीं पाएँगे; हम, हम नहीं रह पाएँगे। हमें यकीन हो चला है कि अब इस जिन्दगी में फिर से फूल की महक नहीं मिल पाएगी। जिन्दगी चाहे हजार बरस की हो जाए पर शायद वे फूल फिर महक नहीं पाएँगे। हाथों में वह एक लकीर ऐसी भी है जो नदी की तरह खड़ी हो कर हमें अलग अलग किनारे पर खड़ा करके एक अट्टहास कर रही है। ये गंधर्व हैं। अभिशप्त गंधर्व। विशुद्ध, अविकारी, अमल, तरल, सरल। पर ध्रुवों की तरह इस पार, उस पार। क्या यह स्पन्दन अकेला इस पार ही है? क्या संदेशी कपोत नदी की धार में गिर कर कहीं बह गए हैं? सारे सवाल खुद से खुद के हैं।
अजीब हिसाब है किस्मत लिखने वाले का मछली को पानी से अलग कर क्या देखना चाहता है? उसका पानी से इतना प्रेम क्यों दे दिया। पानी उसकी प्यास बुझाने के लिए नहीं, उसकी जिन्दगी है।
हम जानते हैं कि पत्थर को पसीने नहीं आते पर उसके सामने अगर चीखे तो वह हमारी चीखें हमें वापस लौटा देगा। हम ऐसे ही शिलाखण्डों के बीच घिरे खड़े हैं, इस पार और उस पार। शब्दों की अनुगूँज जीवन को और अधिक संबल नहीं दे पाएगी। कोई यह नहीं चाहता कि धुँआ हो, बस आग हो, जलन हो। दीप को जलते ही देखना चाहते है। सब लोग?

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*कभी कभी प्रस्तर तोड़ कर
पीड़ा प्रकट हो जाती है
रोकते तो वृणों का जन्म हो जाता
इनमें विकल आँच होती है
पर गहरी एक साँच होती है

*🕊🐎🐬🛶🌌*

*पल आते पल जाते*

पल पल, आते जाते पल
थोड़ा सा दे कर  
बहुत सा छीन ले जाते पल
भर जाते गागर
पर खुद रीत जाते पल
नियति का चिराग,
जलता है अंधेरों में
जले नहीं अगर तो
खुद अंधेरे में खो जाएगा
जलता रहा तो कभी उन्हें
कभी खुद को दिख जाएगा

कभी नयन लजाते
कभी अकुलाते पल
सिमटते चले गए लकीर में
लकीर का नाम हो कोई भी
"लकीर" हृदय पर खींच गए पल
देखता हूँ कभी इस लकीर को,
कभी अपने ही अतिरेक को
पल पल, आते जाते पल
थोड़ा सा दे कर  
बहुत सा छीन ले जाते पल

आशाएँ, निराशाएँ, हताशाएँ
तैरती झील में, कश्ती में
न मल्लाह न मस्तूल
डूबती, उतराती, गहराती
पूछती तारों से स्याह रात में
कहीं देखा है तुमने
उनको, उनकी गति रेख को
दिशाएँ, फिजाएँ, हवाएँ
चिर मौन हैं, स्तब्ध है
जाने कौन से अनुबन्ध हैं
पल पल, आते जाते पल
थोड़ा सा दे कर  
बहुत सा छीन ले जाते पल*

रामनारायण सोनी

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