गुलाब के हसीन सुर्ख फूल
कुछ पल महक कर
जिन्दगी महका गए
गोद में रखा सिर
उन गहरे कुंतलों में
मुस्कराते चाँद से
अकसर खेलता है
यादों के बिछौनो पर
मन करवटें लेता है,
कभी तपती धूप को
दुशाला बना कर ओढ़ता
घने उस बरगद के तले
गहन शान्त खड़े
नीरव से शिवालय की
घनघनाती घंटियों की आवाज
तैरती हुई आ जाती है
तो कभी उस अमराई में
कोयल कूक उठती हैं
मुँदे-अधमुँदे नयन अभिराम
उन्नत सा भाल ललाम
भूख से भरा पेट, मन गीला सा
कौर आधे-आधे बँटे-बँटे
अधरों पर उन पोरों की छुअन
आज भी गुदगुदाती हैं
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