मन से अमन होना
यह सत्य है कि लकड़ी में आग अन्तर्निहित है परन्तु बाहर से जब तक चिंगारी न मिले तब तक वह बाहर नहीं आ सकती। लकड़ी के बर्फ में वर्षों दबी रहने के बाद भी यह आग नहीं मरती। बाहर से आई अग्नि लकड़ी ग्रहण करती है तो लकड़ी जल उठती है। यह संकल्प की तरह है जो बाहर की सूचनाओं, वासनाओं को ग्रहण करती है। इसी तरह बीज यदि कई वर्षों तक भंडार में पड़ा रहे तो भी उसमें निहित उर्वरा समाप्त नही होती फिर चाहे वह धतूरे का हो या आम का। संकल्प उन्हें वापस सृजन में, विकार में ढकेल देते हैं।
मन का अमन होना आत्मसत्य के बोध होने की परम आवश्यकता है। मन को आत्मसत्य की उपलब्धि के होते ही मन अमन हो जाता है।
जैसे खुले मुँह का खाली घड़ा या तो हवा से भरा होता है या पानी से भरा; खाली तो हम उसे अपनी नासमझी में ही बोलते हैं, वह हवा निकाले जाने के बाद भी निर्वात से भरा होता है पर भरा तो वह सदा रहता ही है। घड़ा यदि जीवित होता तो वह समझ सकता था कि वह सदा ही भरा होता है। उसका यह भाव उसे पूर्णत्व और आत्मसत्य की अनुभूति है। मन जब यह समझ ले तो उसे बाहर से कुछ भी ग्रहण करने की जरूरत नहीं होती इसके लिए उसे पूर्णत्व का अहसास होना ही है। ग्रहण करना ही संकल्प है। संकल्प अवस्था में पूर्णत्व खो जाता है मर नहीं जाता। पूर्णता तो उसका नैसर्गिक गुण है। जैसे बादलों के छा जाने से सूर्य का न होना लगता है पर बादलाें के हटते ही सूर्य पुनः प्रकट हो जाता है। उसी प्रकार मन संकल्प वान होता है तो आत्मसत्य का न होने जैसा लगने लगता है। संकल्प के बादल आते ही आत्मसत्य की अनुभूति का कृत्रिम अभाव लगने लगता है और संकल्प रहित होने पर अभाव समाप्त हो जाता है।
मन का अमन होना आत्मसत्य के बोध होने की परम आवश्यकता है। मन को आत्मसत्य की उपलब्धि के होते ही मन अमन हो जाता है।
जैसे खुले मुँह का खाली घड़ा या तो हवा से भरा होता है या पानी से भरा; खाली तो हम उसे अपनी नासमझी में ही बोलते हैं, वह हवा निकाले जाने के बाद भी निर्वात से भरा होता है पर भरा तो वह सदा रहता ही है। घड़ा यदि जीवित होता तो वह समझ सकता था कि वह सदा ही भरा होता है। उसका यह भाव उसे पूर्णत्व और आत्मसत्य की अनुभूति है। मन जब यह समझ ले तो उसे बाहर से कुछ भी ग्रहण करने की जरूरत नहीं होती इसके लिए उसे पूर्णत्व का अहसास होना ही है। ग्रहण करना ही संकल्प है। संकल्प अवस्था में पूर्णत्व खो जाता है मर नहीं जाता। पूर्णता तो उसका नैसर्गिक गुण है। जैसे बादलों के छा जाने से सूर्य का न होना लगता है पर बादलाें के हटते ही सूर्य पुनः प्रकट हो जाता है। उसी प्रकार मन संकल्प वान होता है तो आत्मसत्य का न होने जैसा लगने लगता है। संकल्प के बादल आते ही आत्मसत्य की अनुभूति का कृत्रिम अभाव लगने लगता है और संकल्प रहित होने पर अभाव समाप्त हो जाता है।
आत्मसत्यानुबोधेन न संकल्पयते यदा । अमनस्तां तदा याति ग्राह्याभावे तदग्रहम् ॥ ३२ ॥
अब चूँकि मन संकल्पवान होता है इसे संकल्प रहित किया जाना एक विलक्षण आध्यात्मिक प्रक्रिया है।
इसकी प्रथम सीढ़ी है मन की ग्रहण शक्ति में निरोध करना, दूसरी सीढ़ी है उसे इस स्थिति में टिकाए रखना जैसे घड़े के मुँह को ढँकना और फिर उसे ढँके रखना। मन की यही आदर्श स्थिति है "मन का अमन होना"। यह भाव अमनीभाव है।
अब चूँकि मन संकल्पवान होता है इसे संकल्प रहित किया जाना एक विलक्षण आध्यात्मिक प्रक्रिया है।
इसकी प्रथम सीढ़ी है मन की ग्रहण शक्ति में निरोध करना, दूसरी सीढ़ी है उसे इस स्थिति में टिकाए रखना जैसे घड़े के मुँह को ढँकना और फिर उसे ढँके रखना। मन की यही आदर्श स्थिति है "मन का अमन होना"। यह भाव अमनीभाव है।
मनोदृश्यमिदं द्वैतं यत्किञ्चित्सचराचरम् । मनसो ह्यमनीभावे द्वैतं नैवोपलभ्यते ॥ ३१ ॥
अमनीभावः - मनोजयः - मनोमिथ्यात्वनिश्चयः ।
सङ्कल्पनम् - perceiving a real duality
सङ्कल्पनम् - perceiving a real duality
मन में से सकल्पों का निरोध होते ही द्वैत समाप्त हो जाता है। बहुत साफ है कि द्वैत का आभास इसी शक्तिशाली मन से है। मन कभी मरता नहीं है। इस मन से ही एक भीतर और एक बाहर अलग अलग अनुभूत होता है। जैसे एक आदमी दहलीज पर खड़ा है और देख रहा है तो उसे भीतर और बाहर अलग अलग दिखता है पर यदि भीतर से संपूर्ण देखे तो सारी विधाएँ एक सदृष, समरस होंगी। परन्तु हमें यह भीतर देखने वाला और बाहर देखने वाला मन भी अलग अलग लगता है। जैसे जब हम जाग रहे होते हैं तो बहिर्जगत दिखता है वहीं भीतर ही भीतर स्वप्न देखने वाला मन हमें दूसरा लगता है क्योंकि हम तो यही समझते हैं कि हम सो जाते हैं तो मन भी हमारे संग ही सो जाता है फिर वहाँ स्वप्न में यह जगत देखने वाला मन कैसे जा सकता है। वस्तुतः मन तो सिर्फ एक ही है दोनों तरफ वही जागता है, वही देखता है। जब जगत देखता है तब स्वप्न नहीं देखता और स्वप्न देखता है तब जगत नहीं देखता है। मन अगर दो होते तो दोनो एक ही समय (जगत और स्वप्न) एक साथ देखे जा सकते थे। मजे की बात तो यह है कि एक से दो बताने वाला भी वास्तव में तो मन ही है। मन के इस द्वैत देखने के आयाम मात्र आभास है ठीक उसी तरह कि जब स्वप्न देखते हैं तो वह इतना सत्य लगता है जितना जाग्रत अवस्था में देखने में लगता है। "केवल खुद मन ही समर्थ है जो अमन की अवस्था में ले जा सकता है।"
आत्मसत्यानुबोधेन न संकल्पयते यदा ।
अमनस्तां तदा याति ग्राह्याभावे तदग्रहम ।।33।।
माण्डूक्य कारिका .अद्वैत प्रकरण -_
आत्मसत्य की उपलब्धि होने पर जिस समय मन सङ्कल्प नही करता उस समय वह अमनी भाव को प्राप्त हो जाता है। उस अवस्था में ग्राह्य का अभाव हो जाने से वह ग्रहण करने योग्य विकल्प से रहित हो जाता है।आत्मसत्य का बोध होने पर यह मन सङ्कल्प नही करता क्योंकि संकल्प के योग्य बाह्य वस्तु का निषेध हो गया है । अब इन्द्रियों से पृथक विषय नही जिनका ग्रहण हो तथा यह मन अमनीभाव को प्राप्त हो चुका है लेकिन इसका यह अर्थ नही कि ज्ञानी की इन्द्रियां जड़ हो जाएंगी पर चूँकि अब इन्द्रियों ने विषयो की ओर दौड़ना छोड़ दिया है ऐसे में उनको दिखाई भी देगा और स्वाद के प्रति उदासीनता हो जाएगी। यदि मिठाई का ज्ञान हो तो उसके हाथ में होने पर मुँह मीठा नहीं हो सकता मिठास रूप अनुभूति तब तक नही जब तक मुख में डाला नही। मुख में डाल भी दिया तब भी यदि सुप्त या मूर्छित हो तो मिठाई का अनुभव नही होगा।
निवेदक
रामनारायण सोनी
रामनारायण सोनी
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