Friday, June 2, 2017

जगदात्मा

    ��जगदात्मा

रोशनी इन चिरागों की अपनी नहीं है
अगर होती इनकी तो हरगिज न बुझते।
अगर कुछ मिटा है तो तैल और बाती
मगर हम चिरागों को रोशन समझते।।

न टपके अगर नूर की बूँद उसकी
घटाटोप अंधियार जग का न जाता।
रोशनी है वो ही रोशनी है उसी की
वो ही चेतना बन के हम में समाता।।

यहाँ भी वही है और वहाँ भी वही
वही दूर भी है वही पास सब के।
न जाता न आता सदा सत्य ही है
बाहर वही है और भीतर भी सबके।।

निवेदक
रामनारायण सोनी

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【@ईशावास्योपनिषद

तदेजति तन्नैजति तद्दूरे तद्वन्तिके।
तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य बाह्यतः॥५॥

(वह आत्मतत्त्व चलता है और नहीं भी चलता । वह दूर है और समीप भी है । वह सबके अंतर्गत है और वही इस सबके बाहर भी है (अर्थात वह परमात्मा सृष्टि के कण कण में व्याप्त है )॥5॥)】

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