Friday, June 2, 2017

बच्चे और दादी माँ की कहानियाँ


  बच्चे और दादी माँ की कहानियाँ

क्या आप जानते हैं कि दादी माँ बच्चों को रात को सोते समय ही कहानियाँ क्यों सुनाती है? हकीकत यह है कि न दादी यह जानती है, न माँ  जानती है और न ही बच्चे। वास्तव में यह उपनिषदों के गूढ़ सिद्धान्तों का व्यावहारिक स्वरूप है। आइये इसे जरा देखें।
हर व्यक्ति जागता है फिर सोता है फिर जागता है फिर सोता है। यह जीवन चक्र का आवश्यक अंग है। हम सुबह जब उठते हैं तो पिछले पूरे दिन भर की थकान को नींद लेकर दूर कर चुका होता है और तरोताजा हो कर आज दिन भर के काम के लिए तैयार होजाते हैं।
इस प्रक्रिया में कुछ मुख्य बातें इस प्रकार है।
१ शरीर दिन भर काम करके थकता है।
२, नींद आने के पहले शरीर, फिर इन्द्रियाँ और अन्त में मन शिथिल पड़ता है।
३, नींद जब तक रहती है तब तक शरीर की बाहरी कोई प्रक्रिया नहीं होती है।
४, रात को नींद में यदि सपने अधिक आते हैं तो दूसरे दिन शरीर, मन और सभी इन्द्रियाँ थके थके से अनुभव करते हैं।
५, यह सब प्रकृति के नैसर्गिक नियमों के अधीन है। लेकिन इन नियमों को अच्छी तरह समझ कर हम अपने व्यवहार में विनियमन करें तो परिणाम रोचक होंगे।

अब इसे उपनिषद के आलोक में देखें। सभी उपनिषदों में सबसे छोटा, १२ मंत्रों का उपनिषद् है "माण्डूक्य" उपनिषद्। इसमें हमारे शरीर के तीन प्रभाग बताए गए हैं। पहला बहिःकरण दूसरा अन्तःकरण और तीसरा हमारी अन्तश्चेतना। बहिःकरण मतलब सम्पूर्ण भौतिक शरीर, अन्तःकरण शरीर का वह प्रभाग
है जो दिखाई नहीं देता जिसमें शामिल है मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार और तीसरा प्रभाग है अन्तश्चेतना जो सम्पूर्ण शरीर में, कण-कण में व्याप्त है। उपनिषद् इसे ईश्वर की अहम सत्ता निरूपित करता है। चेतना है तो जीवन है। चेतना गई तो जीवन गया। यह अपने आप में एक वृहद्  विषय है। इसे अन्य संदर्भ में देखेंगे।
आपको अभी तक यह लग रहा होगा कि दादी माँ की कहानी में इस तरह बड़ी बड़ी व्याख्याओं की क्या जरूरत है परन्तु उक्त प्रक्रिया में  उपनिषद् के उक्त सिद्धान्त परोक्ष रूप में अभिन्न रूप से जुड़े हैं।
सोचिये दादी कहानी सुबह या दिन में क्यों नहीं सुनाती? कहानी माँ, पिता या दादा क्यों नहीं सुनाते? सभी सुनाई जाने वाली कहानी मन को शीतलता देने वाली, परियों की, राजा रानी की, प्रेरणाप्रद, मनोरंजक और कहें तो नींद लाने वाली क्यों होती है? इन प्रश्नों का उत्तर आपको यहाँ इस लेख में देने का प्रयास करूँगा।

जब हम सोने जाते हैं तो सबसे पहले शरीर शिथिल होता है फिर इन्द्रियाँ शिथिल होती है लेकिन मन जागता रहता है। शरीर और इन्द्रियाँ जल्दी शिथिल होती है लेकिन मन समय लेता है। जब शरीर और इन्द्रियाँ क्रियाशील हों तो मन उनमें और बहिर्जगत में रमता रहता है और उसकी ग्राह्य शक्ति कम रहती है। इसलिये इस समय दिये गये संदेश उस पर गहरा प्रभाव नहीं छोड़ते हैं। सोने पर व्यक्ति को या तो स्वप्न आते हैं या स्वप्न आते ही नहीं। उपनिषद् कहता है कि कौन है जो सोने पर स्वप्न देखता है और जागने पर हमें बताता है। अगर हम स्वप्न न देखे और चुपचाप सोते रहे तो इससे मन को भी आराम मिलेता है। सोते हुए स्वप्न विहीन होने की दशा को 'सुषुप्ति' कहते हैं। इस समय मन अन्तश्चेतना के अर्थात् ईश्वर के उस सद्गुण के सबसे निकट होता है और उससे आध्यात्मिक संसर्ग में होता है। सुषुप्ति जितनी लम्बी होगी उतनी ऊर्जा का संग्रहण शरीर और अन्तःकरण में होगा।
अर्थात् जितना शान्त रह कर मन नींद की अवस्था में प्रवेश करेगा उसे स्वप्न कम आवेंगे और सुषुप्ति में सहज ही प्रवेश कर जावेगा।
  अब देखिये, बच्चा बहुत चंचल होता है दिन भर उछल कूद में वह शारीरिक रूप से थक जाता है। बिस्तर पर जा कर उसका शरीर ढीला पड़ जाता है। अन्य चेष्टाएँ भी ठण्डी पड़ जाती है। दादी घर में जीवन के लम्बे अनुभव प्राप्त व्यक्ति है इसलिये उसकी कहानी में व्यावहारिकता शामिल होती है। सोते समय मन अपने संग कहानी की बातें भीतर ले जाता है इसलिये वे स्थाई प्रभाव जमा लेते हैं। मैं ग्यारण्टी से कह सकता हूँ कि अगर आपने अपनी दादी से ऐसी कोई कहानी बचपन में सुनी होगी तो वह आपको आज तक अच्छी तरह याद होगी चाहे उसके मकसद बड़े हो कर समझ पाए होंगे। हम आज इस संस्कार से बहुत दूर चले आए हैं क्योंकि हमारी जीवन शैली बहुत बदल चुकी है।

इस रूपक से दो बातें और भी स्पष्ट होती हैं- एक तो यह कि दादी भी इस सिद्धान्त को जाने कि बालक को क्या दिशा देनी है। कहानी केवल मनोरंजन न हो। दूसरी बात यह कि पहले बच्चे  के मन को ऐसी अवस्था में पहुँचाए जहाँ वह संदेशों को अच्छे से ग्रहण कर सके।

अगले अंक में हमारा चिन्तन इस से आगे चलेगा कि सुषुप्ति तक सो कर ही जा सकते हैं या जागते हुए भी जा सकते हैं। क्या इस तक बच्चे ही जा सकते हैं या अन्य अवस्था के लोग, आप या हम भी जा सकते हैं।

विनीत
रामनारायण सोनी

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