Friday, June 2, 2017

जिजीविषा

     "जिजीविषा"

कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छत समाः।
एवं त्वयि नान्यथेतोस्ति न कर्म लिप्यते नरे ॥२॥

तात्पर्य यह कि प्रत्येक व्यक्ति को सौ वर्षों तक जीने की इच्छा करनी चाहिये। कोई नैराश्य में कब तक जिएगा। अगर वह इस तरह श्वाँस लेता भी है तो लुहार की 'चमड़े की धौकनी' की तरह ही है। प्रत्येक स्वाँस जीवन की पोषक है और परमात्मा का वरद है। इसे गवाँना परमात्मा की प्रसाद की अवमानना है। जितनी स्वाँसें चलनी है वे चल कर रहेगी। नियति के नियमों में व्यवधान क्यों करें। जीवन में रसात्मकता बनी रहे। विज्ञान सिद्ध करता है कि बहती नदी में अपावन जल भी शुद्ध हो जाता है। उसका बहना और बहते रहना धर्म है। क्या आप जानते नहीं कि नदी का जल प्रति क्षण बदल रहा है। वह प्रति पल नूतन हो रही है क्योंकि वह बह रही है, चल रही है। यही जिजीविषा का सिद्धान्त है। चरैवेति, चरैवेति, चरैवेति। जो दीपक की ओर पीठ करके चला उसके मार्ग में सिर्फ अन्धकार ही होगा और जो प्रकाश की ओर उन्मुख है अन्धाकार भले ही पीछे चलता रहे उसकी परवाह न करे क्योंकि प्रकाश का स्रोत चाहे जितना बड़ा हो वह अन्धकार से सदैव आच्छादित रहेगा। सिर्फ सुख मिले, ऐसी कल्पना नहीं कर सकते लेकिन प्रकाश की जिजीविषा संग है तो अन्धकार दूर ही खड़ा तकता रहेगा। जिस दिन जीवन का उद्गम हुआ उसी क्षण से वह मृत्यु की ओर दौड़ रहा है। जन्म और मृत्यु जीवन के दो चरम बिन्दु हैं और दोनों नियती के आधीन है। इसके बीच का काल खण्ड ही जीवन है। इसे जीना हमारे हाथ है। स्वाँस का चलना जीवन नहीं है अपितु जीवन को उत्साह से भर कर जीना वास्तव में जीवन है। यही जिजीविषा है।
आपका अतीत ठीक वैसा ही नहीं रहा है जैसा आपने सोचा था, जैसी आपने कल्पना की थी, जैसी आपने अपेक्षा की थी। इसका यह अर्थ यह कदापि नहीं है कि आपका भविष्य अतीत से बेहतर नहीं होगा या जिस तरह के सपने आप आज देख रहे हैं वैसा नहीं हो सकेगा। जीवन में आशा कभी और कभी नहीं छोड़ना चाहिए। आशा और स्वप्न एक ही खूँटे से बन्धे हैं वह खूँटा है 'जिजीविषा'। जिजीविषा का सीधा सा मतलब है जीने की चाह, जीने की ललक। जो जीना ही नहीं चाहता वह जीवन का मूल्य ही नहीं समझता और अक्सर जब तक उसे समझ में आता है तब तक उसका अमूल्य वर्तमान अतीत बन चुका होता है। जो अतीत बन गया उसे स्वयं ब्रह्मा भी नहीं लौटा सकते और न ही पलट सकते। यह अतीत कभी न कभी आपका वर्तमान ही था जो बीतता चला गया और आज आपका इतिहास बन गया है। उस क्षण आपने जो जो आशाएँ की थी, जो स्वप्न देखे थे, जिस भविष्य की कल्पना की थी वह आज आपके सामने वर्तमान बन कर खड़ा है और आपकी जिजीविषा को परखने को तत्पर है।

किसी कवि ने कहा है:-
आशा की अँगड़ाई, फैली दिग्दिगन्त है ।
बीत गये दुख-पतझड़, जीवन में बसन्त है ।।  
पथ पर पग दो चार बढ़े, हो मन उमंग में उत्साहित ।
भावनायें उन्मुक्त और मैं लक्ष्य-प्राप्ति को आशान्वित ।
रुक जाने का समय नहीं, घट भर लेने हैं अनुभव के,
कर्म बसी भरपूर ऊर्जा, सुखद मनोहर पथ लक्षित ।।१।।

बीच राह, सब ओर स्याह, पुरजोर हवायें बहती थीं ।
काल करे भीषण ताण्डव, चुप रहे जीवनी सहती थी ।
दुख आते, मन अकुलाते, कुछ और स्वप्न ढल जाते हैं ।
अनचाही पर उस पीड़ा को, हम सहते हैं, बल पाते हैं ।
कुछ और अभी पल आयेंगे, कष्टों का बेड़ा लायेंगे,
फिर भी आशा है, जीवन है, हम भूधर से डट जाते हैं ।।३।।
फिर भी आशा है, जीवन है, हम भूधर से डट जाते हैं ।।

क्या आप अपने पुरुषार्थ से इस क्षण को अपनी आशाओं के साँचे में ढालना नहीं चाहेंगे? यदि नहीं तो आप इसे भाग्य के मत्थे मढ़ कर अपनी अकर्मण्यता को छिपाना चाहते हैं। आपकी आशाऍ मर चुकी है। क्या आपको विश्वास नहीं है कि कल सुबह होगी, क्या विश्वास नहीं है कि अब मौसम भी बदलेंगे, क्या संसार का क्रम अब समाप्त हो जावेगा? स्पष्ट है जीव, जगत और जगदीश; सभी मौजूद होंगे फिर आपने यह क्यों समझ लिया कि आप इन सबसे अलग हैं, निराशी हैं।
इसलिए उपनिषद् कहता है:-
उत्तिष्ठ जाग्र वरान्निबोधत।

निवेदक
रामनारायण सोनी

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