*मेरा मन्तव्य....*
वर्णव्यवस्था तो पढ़ने में आई है परन्तु जाति व्यवस्था का उल्लेख पौराणिक अथवा वैदिक काल में कहीं आया हो तो बताएँ।
एक विसंगति अौर है- वन्य अौर गिरिजनों का उल्लेख रामायण और महाभारत दोनों कालों में आता है जबकि वे चार में से किस वर्ण में गिने गए है? इसका कोई पता नहीं। इन्हें भील, कोल, किरात आदि वर्ग से इंगित किए गए हैं। शोध कर्ताओं ने समग्र संस्कृति को पाञ्चजन्य के रूप में उल्लिखित किया है। वस्तुतः ये वे लोग है जिन्हें जाति के रूप में नहीं अपितु स्थानीयता/क्षेत्रीयता में संज्ञित किए गए हैं।
वर्ण व्यवस्था में दोष महाभारत काल की देन है जहाँ कुलगुरू कृपाचार्य और गुरू द्रोणाचार्य जैसे ब्राह्मण हो कर क्षत्रियों के कर्म में उतरने के बावजूद अपने ब्राह्मणत्व के चोले से बाहर नहीं निकल पाए। यदि यह कहा जाए कि स्वयं परशुराम को क्यों ब्राह्मण कहा जा रहा है जबकि वे संपूर्ण जीवनकाल में क्षात्रधर्म से चिपके रहे। इस बात के लिए मेरे इस मन्तव्य का घोर विरोध किया जाएगा। द्रोण अौर कृप जैसे चरित्रों ने जाति व्यवस्था की नींव रखी है। संभवतः वे उनके काल में समाज में श्रद्धेय अौर पूज्य माने गए थे। इनके विसंगति पूर्ण कृत्यों का विरोध समाज नहीं कर पाया क्यों वे राज्याश्रय प्राप्त और राज्य सभा के प्रतिनिधि सदस्य भी थे। वहीं विदुर को आजीवन शूद्र माना गया, कर्ण को सूतपुत्र माना गया, घटोत्कच भीमसेन का पुत्र होने के बावजूद वन प्रान्तरों से बाहर नहीं निकल पाया और किस वर्ण में उनको सम्मिलित किया गया इसके संकेत नहीं मिलते। इसी तरह कुल और वंश के अनुगतों को कर्म के वर्गीकरण से अलग रख कर वर्ण व्यवस्था को विच्छिन्न करने के मूल कारण बने हैं। वंशानुगत होना ही जाति व्यवस्था का स्तंभ है।
एक बात अौर है; शूद्र को हमने अपने ढंग से परिभाषित कर लिया है। अन्यथा शूद्र वे हैं जो तीन अन्य वर्णों की सेवा का कार्य करते थे, उनके नियत कर्मों में सेवा के माध्यम से सहायक होते थे। गीता में इस आशय का स्पष्ट उल्लेख है। अब यदि कर्मों के आधार पर सेवा का निष्पादन करने वालों को वर्ण व्यवस्था के ढाँचे में फिट किया जाए तो कोहराम मच जाएगा।
अस्तु। जाति व्यवस्था को वर्ण व्यस्था में मर्ज (merge) नहीं किया जा सकता है। जाति व्यवस्था के इस परवर्ती स्वरूप को स्पष्ट रूप से देखें तो अब कर्मों से इसका कोई लेना देना नहीं है।
.....क्रमशः
रामनारायण सोनी
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