Wednesday, November 15, 2017

सौंदर्य

😴आज का कालचिन्तन🤔

      🥀🎼सौंदर्य  🐦🌞

"सौंदर्य" के समानार्थी शब्द हैं.....सुन्दरता, कमनीयता, रुचिरता, मनोहरता, मनोरमता, मंजुलता, मोहकता, चारुता इत्यादि -
सौंदर्य को पारिभाषित किया जाना सरल नहीं है क्योंकि यह अनुभूति का विषय है।

सौंदर्य एक पक्षीय नहीं है। इस विषय में चिन्तन प्रारंभ करें तो इसे तीन स्तरों के एकीकृत स्वरूप में देखना होगा।
दृष्य, दृष्टि और बोध।
यदि दृष्य उपलब्ध हो पर दृष्टि और दृष्य के प्रभाव का बोध न हो तो सौंदर्य अज्ञात होगा, अनुपयोगी होगा। और यदि दृष्य अौर दृष्टि है पर सौंदर्य-बोध न हो तो उसका प्रभाव नहीं होगा। एक ही दृष्य में अलग - अलग दृष्टिकोण से देखा गया में बोध भी अलग - अलग प्रभावकारी होगा।
सौंदर्य बोध में भारतीय और पाश्चात्य दृष्टिकोण अलग अलग है। पाश्चात्य दृष्टिकोण में प्रकृति अर्थात् सृष्टि अौर जगत का सौंदर्य बाह्य सौंदर्यबोध ही है जबकि भारतीय दर्शन इसे बाह्याभ्यन्तर दृष्टिकोण से देखता है। जैसे कि नृसिंह भगवान की सुन्दर प्रतिमा में पाश्चात्य जगत मूर्ति की केवल ललित कला का सौंदर्य ही देखता है पर हम उसमें इसके साथ-साथ उसके आध्यात्मिक सौंदर्य की भी अनुभूति करते हैं।
आध्यात्मिक अनुभूतियों के जागरण से प्रकृति के सौंदर्य को, पदार्थों में छिपे लालित्य को समझ सकना संभव होता है। किसी चित्र की सुन्दरता को देखकर प्रसन्नता प्राप्त कर पाना तभी संभव है जब देखने वाले की आँखों में ज्योति हो। यदि ऐसा नहीं हो तो अन्धी आँखें उस सुन्दर चित्र में से क्या प्राप्त कर सकेंगी? कलाकारों के मधुर कंठ और सुन्दर वाद्य से निकले संगीत का रस तभी मिलेगा जब कान ठीक से काम करते हो। बहरा व्यक्ति न उस संगीत का रस प्राप्त नहीं कर सकता। इसी प्रकार अध्यात्म के आधार पर विकसित हुआ अन्तःकरण इस जगत के विभिन्न पदार्थों में परमात्मा का सौंदर्य देख सकता है। अध्यात्म दृष्टा तो विभिन्न प्राणियों और पौधों में अपने समान ही समस्त जगत देखकर उन्हें समदर्शी-दृष्टि से देखता हुआ प्रसन्न होता है और वही मनुष्य के अन्दर भरी हुई महानता को अनुभव करके उसे ईश्वर का कृतित्व मानकर श्रद्धा से भर जाता है।
वस्तुतः इस संसार में सर्वत्र सौंदर्य ही सौंदर्य बिखरा पड़ा है, सर्वत्र रस ही रस टपक रहा है। उल्लास और आह्लाद प्रदान करने वाले तत्त्व हर वस्तु में हर प्राणी में, हर व्यक्ति में भरी पड़े है। उसे ढूँढ़ सकने, समझ सकने और अनुभूति में उतार सकने की आध्यात्मिक क्षमता को कला कहते हैं। कला मात्र कारीगरी नहीं है। संगीत, कविता, नृत्य, वाद्य, गायन, सज्जा चित्रकारी, मूर्ति निर्माण और साहित्य सृजन आदि तो उसे विकसित करने के विभिन्न माध्यम हैं। हमारी कला का प्राण है- आध्यात्म।
"आध्यात्मिक दृष्टिकोण के द्वारा हम पदार्थों में समाहित सृष्टा के सौंदर्य को खोज निकालने में सफल होते हैं।" यह कमाल हमारे भीतर उपलब्ध अध्यात्म का है। कला में जो रस है वह परमात्मा के आनंद की ही एक ही झाँकी है। कला का उद्देश्य यही है और होना भी यही चाहिए। ऐसा होने पर मनुष्य अपने चारों और बिखरे हुए-जड़ चेतन में ओत प्रोत अनन्त सौंदर्य को ही देखता है, अनुभूत करता है। 

निवेदक
रामनारायण सोनी

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