Sunday, December 3, 2017

धारणा

यह बाहरी प्रकाश और देखे गए दृष्य की धारणा का नियम है जिसे विज्ञान में परसिस्टेंन्स कहते हैं। थियेटर में जो मूवी आप देखते हैं उसमें एक के बाद एक चित्र आते हैं लेकिन हमें सब चलता हुआ दिखाई देता है। यह बाहरी धारणा है।
अष्टांग योग का छटवाँ चरण है "धारणा"। जिस प्रकार बाहरी धारणा शक्ति से चित्र की प्रतिकृति आँख धारण करती है उसी प्रकार मन की वृत्ति मन में लाए गए प्रतिमान को धारण कर लेती है अौर कुछ समय तक स्वयमेव रुकती है लेकिन मन के विचलित होते ही धारणा समाप्त हो जाती है। चित्र को निरन्तर देखने से उस बिन्दु के अतिरिक्त कुछ नहीं दिखाई देता है यहाँ तक कि बुद्ध का चेहरा भी नहीं दिखाई देता है। यह स्थिति निर्विचारिता की है अर्थात् मानस पटल पर धारित किए बिन्दु के अतिरिक्त वहाँ कुछ भी न हो तो धारणा प्रबल हो जाती है। जिस प्रकार दीवार पर बनी प्रतिकृति कुछ ही क्षणों में अदृष्य हो जाती है उसी प्रकार मन में धारण की गई छबि भी गायब हो जाती है जिसे मन को निरोध कर के रोका जा सकता है। मन के निरोधात्मक प्रयास से धारणा पुष्ट हो जाती है। यहाँ तक कि हम रोजमर्रा के काम करते रहें तब भी धारित मूर्ति, प्रतीक, चिन्ह, ओंकार ध्वनि आदि जो पूरी कॉन्सन्ट्रेशन से धारित किया गया हो वह दिन भर मन में चलता रहता है।

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