जब मैं (अपना आकार लेकर) दर्पण के सामने जाता हूँ तो दर्पण में प्रतिबिम्ब के रूप में स्थित हो जाता हूँ पर हटता हूँ तो अपना वह प्रतिबिम्ब उससे वापस ले लेता हूँ। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो मैं अपना प्रतिबिम्ब स्वयं मुझ में समेट लेता हूँ। मेरे आकार (शरीर) के साथ ही मेरा प्रतिबिम्ब भी चलता है। मुझमें वह सामर्थ्य है कि मैं अपना प्रतिबिम्ब स्वयं में समेट सकता हूँ। मैं हूँ तो प्रतिबिम्ब है मैं नहीं तो प्रतिबिम्ब नहीं। इस पूरे क्षेपक में मैं सर्वोपरि है। देखने वाला भी निश्चित रूप से मैं ही हूँ। यहाँ प्रकाश की उपस्थिति अनिवार्य है। इसी तरह जब मैं चलता हूँ तो मेरी प्रतिच्छाया मेरे साथ चलती है ठीक उसी तरह जैसे मेरा प्रतिबिम्ब मेरे साथ चलता है। इन दोनों संघटनाओं में अन्तर केवल इतना ही है कि सब ओर अंधेरा है तो प्रतिबिम्ब नहीं, सब ओर प्रकाश है तो प्रतिच्छाया नहीं। लेकिन दोनों में समानता यह है कि प्रतिबिम्ब या छाया मुझ में ही सिमट गई क्योंकि दोनों मुझसे ही हैं और दोनों का कारण भी मैं ही हूँ। प्रतिबिम्ब अंधेरे में कहाँ चला गया? यह अविद्या है जो अंधकार ही है, इसके चलते मेरा और मेरे प्रतिबिम्ब का स्पष्ट अहसास नहीं है। प्रतिच्छाया कहाँ चली गई? जो प्रकाश के आते ही चली गई। यह विद्या है जिसके चलते मैं अपने आत्मभाव को उपलब्ध हुआ हूँ। मैं और मेरी प्रतिच्छाया तथा मैं और मेरा प्रतिबिम्ब हाेना एक अहसास है। इनमें से सर्वत्र उपलब्ध "मैं" हूँ। अंधकार में भी था, प्रकाश में भी था। प्रतिबिम्ब को मैं समझने वाला भी मैं ही था क्योंकि वहाँ ही पूरा आभास हो रहा था।
जब प्रतिच्छाया और प्रतिबिम्ब है तब तक द्वैत का आभास है लेकिन जब बिम्ब और छाया नाम की उपाधियाँ भी विलुप्त हो जाती है तब अशेष रह जाता हूँ "मैं"। जबकि दर्पण के भीतर और बाहर मैं ही हूँ। एक मैं और दूसरा मेरा प्रतिनिधि। इस अलग होने का प्रबोधन ही जीवात्म भाव है। छाया के साथ भी मैं हूँ और प्रतिबिम्ब के साथ भी मैं ही हूँ। जो आभास है वह स्थितिजन्य है इसलिए अनित्य है। जो अनित्य है वह स्वप्न है। स्वप्नान्त होने पर आभास भी लय हो जाता है।
माण्डूक्य श्रुति के अनुसार
जाग्रत और स्वप्न में "एकोनविंशतिमुखः" है। अर्थात् दस इंद्रियाँ, पाँच प्राण अौर चार अन्तःकरण कुल उन्नीस मुख जो कि इन्हीं अवस्थाओं में प्रभावी हैं। ये सुषुप्ति अवस्था में घनीभूत हो जाते हैं। यहाँ यह स्पष्ट नहीं है कि ये घनीभूत किसमें हो जाते है। छान्दोग्य श्रुति में यह स्पष्ट हुआ है (६/८/१) कि ये प्राण में घनीभूत होते हैं। प्राण किसी भी अवस्था में सोता नहीं है इसलिये शरीर सुषुप्ति अवस्था में भी जीवन से संतृप्त रहता है। माण्डूक्य में एक शब्द का उपयोग हुआ है "एकीभूतः" अर्थात् ये गड्डमड्ड हो जाते हैं।
सुषुप्ति अवस्था में जगत की प्रलय अवस्था है ऐसे में उसके सुख दुःख को आभास करने वाली इन्द्रियाँ और अन्तःकरण विद्यमान हैं। इनके घनी भूत होने से वे सुख दुःख आभास नहीं होते इसलिए वहाँ केवल विशुद्ध दृष्टा शेष है, वह मैं "आत्मा" ही हूँ। छान्दोग्य श्रुति अनुसार " "स्वप्नान्त" सुषुप्त ही है। स्वप्नान्त कब होता है? कहते हैं जब पुरुष सोता है तब "स्वपिति" कहलाता है लेकिन आध्यात्मिक परिदृष्य में इसका सामासिक विच्छेद है- स्वम् अर्थात आत्मा को अौर अपीतः प्राप्त हो जाना। इस स्वप्नान्त अर्थात् सुषुप्ति में पुरुष जीवभाव से रहित हो कर स्वयं को प्राप्त हो जाता है। यही आत्मबोध है।
रामनारायण सोनी
No comments:
Post a Comment