Sunday, May 13, 2018

ॐ मृत्योर्मामृतं गमय

मृत्योर्मामृतं गमय

😞आज का मौलिक लघु चिन्तन🤔

*मुझे अब भीख नहीं चाहिये*

तुम्हारी, मेरी, सबकी देह मिट्टी की है इसीलिए समझदार इसे "पार्थिव" ही कहते हैं। भीतर क्या है? शायद नहीं जानते।
एक भिखारी था। एक जगह मिट्टी का ढेर चबूतरे जैसा बना कर उस पर बैठ कर भीख माँगा करता था। पूरी उम्र भर उस पर ही जमा रहा। कभी नहाया धोया नहीं इसलिये वहाँ दुर्गन्ध ही दुर्गन्ध थी। वह अक्सर कहा करता था कि मैं इस मिट्टी का मालिक हूँ। जब मैं मरूँ तो मुझे मेरी इसी मिट्टी के नीचे दफना देना।
और एक दिन वह मर गया। लोगों ने उस जगह गड्ढा खोदा ताकि उसे दफना सके। खोदते खोदते लोग भौंचक्के रह गए। जमीन के भीतर छिपे एक संदूक में अनमोल खजाना भरा हुआ था। इसी गड़े खजाने पर बैठ कर वह जीवन भर भीख माँगता रहा।

देखो! हमारी इस पार्थिव देह के भीतर भी इसी तरह का अनमोल आध्यात्मिक खजाना भरा पड़ा है।  इसे पहचान लोगे तो खुद कहोगे कि अब और भीख नहीं चाहिए।
चलो अपने भीतर चलें। अकेले अकेले। वहाँ पैदल ही जाना है। अपना नाम, यश, असबाब, रिश्ते, सवारी सब कुछ मिट्टी के द्वार पर रख दो। परमात्मा बाहें फैलाए तुम्हारी, हमारी प्रतीक्षा पर रहा है।

रामनारायण सोनी

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