हमारे जन्म का आध्यात्मिक अर्थ जड़ तत्वों में चेतना का संयोजन होना मात्र है। इसी चेतना से जड़ तत्वों का विकास होता है। अंग्रेजी में कहें तो सारे तत्व किसी न किसी तरह मॉडरेट होते हैं। ये चाहे जितने माडरेट हो जाएँ अन्त तक जड़ ही रहते हैं। चेतना ही ऊर्जा के रुप में रूपान्तरित होती है। ऊर्जा से सभी कार्य होते हैं।
अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत।
अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना।। गीता 2.28।।
हे भारत समस्त प्राणी जन्म से पूर्व और मृत्यु के बाद अव्यक्त अवस्था में रहते हैं और बीच में व्यक्त होते हैं। फिर उसमें चिन्ता या शोक की क्या बात है।
स्रोत है जन्म, बहना है जीवन, विसर्जन है मृत्यु। नदी का ऊर्जामय प्रवाह है चेतना की अभिव्यक्ति। और चेतना परमात्मा की परा शक्ति का गुण है। महसूस करो कि वह परमात्मा हमारे इस शरीर रूपी उपकरण से अभिव्यक्त हो रहा है।
आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेन
माश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः।
आश्चर्यवच्चैनमन्यः श्रृणोति
श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित्।।2.29।।
कोई इस शरीरीको आश्चर्यकी तरह देखता है। वैसे ही अन्य कोई इसका आश्चर्यकी तरह वर्णन करता है तथा अन्य कोई इसको आश्चर्यकी तरह सुनता है और इसको सुन करके भी कोई नहीं जानता।
तत्वों का जड़त्व भी चेतन होने का आभास देता है। जैसे दौड़ती भागती कठपुतलियाँ हमें स्वयं चलती हुई लगती है। महीन धागे और चलाने वाले हमारी दृष्टि से ओझल है। चलाने वाला चेतन है और धागे ऊर्जा कन्वेयर। हमारा जन्म चेतना का सूत्रपात है, ऊर्जा का अवतरण है और मृत्यु इसकी अल्टीमेट प्रोसेस है।
जितने भी कर्म है वे वास्तव में किसी कामना के उद्यम हैं। बगैर कामना के उद्यम नहीं किया जा सकता। उद्यम ऊर्जा के बगैर हो नहीं सकता।ऊर्जा चेतना के बगैर संभव नहीं। वस्तुतः यह ऊर्जा का भीतर से बाहर का प्रवाह है। स्पष्ट है कि यह चेतना ही पहले हम में और कर्मों में अभिव्यक्त हो रही है। मृत्यु के साथ ही चेतना अनभिव्यक्त हो जाती है। बहती हुई नदी का शीर्ष है स्रोत यानी उद्गम, विसर्जन है सागर में।
रामनारायण सोनी
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