Sunday, July 1, 2018

पिंजरे का सौक

*पिंजरे का सौक*
हम पंछी नहीं पिजरों से प्रेम करते है अौर सोने के पिंजरे हों तो क्या कहने?
पिंजरे वे जगह हैं जहाँ पालतू पंछी, पालतू जानवर रखे जाते हैं और सर्कस जैसी जगह में हिंसक जीव रखे जाते हैं; याद रहे कि वे रहते नहीं हैं अपितु अपने मजे के लिए उन्हें वहाँ रखे जाते हैं। उनके रहने की जगह कहीं और हैं। पिंजरा दे कर हम उनका घर छीन लेते हैं। दाना पानी तो हम उन्हें इसलिए देते हैं कि हमारा पिंजरा आबाद रहे, हमारे सौक पूरे होते रहें।
पिंजरे और उसमें रहने वाले प्राणी की तारीफ कहानी जब हम बयान करते हैं तो हमारा सीना पिंजरे के अनुपात में फूल जाता है जबकि उस सोने के पिंजरे से अच्छा तो तिनके का आशियाना था, उस पंछी की वही ऐशगाह थी। वे प्राणी भी प्रकृति की गोद में अपने मजे थे। हमने मात्र अपने सौक के बदले उस जीव का जीवन बलि चढ़ जाता है।
बतर्ज जीव जन्तु के, आदमी भी पिंजरों में रखे जाने लगे हैं। लोहे के पिंजरों में मजदूर तो सोने के पिंजरों में स्किल्ड मजदूर। कहीं कहीं रिश्तों के पिंजरे हैं तो कहीं जिम्नेदारी के। कभी कभी तो आदमी अपने लिए खुद का ही पिंजरा तैयार कर लेता है; उसमें जा कर स्वयं बैठ जाता है अौर कहता है क्या करूँ बेबस हूँ। वह नैसर्गिक से वर्चुअल दुनियाँ में खुद चला जाता है। जब बाहर आने का समय होता है तब तक शरीर जवाब दे जाता है। अपना देश, अपने रिश्ते और अपने लोग छूट जाते हैं। भावनाएँ प्रेशर कुकर में दबी दबी, रुकी रुकी भाप तरह बस संतृप्त हो जाती है। उसके दबाव में आदमी बेबस-बेचैन है, अपने ही पिंजरे में।
कहीं यह कथानक मेरा तो नहीं? मैं यह सोचने पर मजबूर हो हूँ।

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