मेरे आलेख और रचना
धागे हमने चुने लचर अब गाँठ उम्र भर लगनी है साँसे हमने बुनी कुवाँरी अब चादर कहाँ सुधरनी है
धोबी धोवे कूट कूट कर
लौट आओ चाँद मेरे! सुनो तुम भी ! मेरा चाँद अब नक्षत्र हो गया है। वह पहले भी मेरी धरती की रात में दिखता था और अब भी। चाँद शायद यह सोचता होगा ...
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