Tuesday, April 9, 2019

उम्र की बीती कहानी


*उम्र की बीती कहानी*

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*"उम्र की बीती कहानी याद फिर आयी कहीं से।"*
अतीत की कन्दराओं में उकेरे भित्तिचित्रों में भी कई आख्यान उभरते हैं। जिन में से कुछ हमने बनाए है कुछ कोई और चितर गया है। ये बोलते भी हैं जैसे बुन्देले हरबोलो के मुख से झाँसी का इतिहास फूट पड़ता है। इन आख्यानों में छुपे होती है कुछ रहस्य, कुछ स्मृतियाँ, कुछ अनुभूतियाँ। इनमें समाहित हैं जीवन से जुड़े यथार्थ, खट्टे-मीठे, कषाय-तिक्त और संगतियों-विसंगतियों के भिन्न भिन्न आस्वादन। अजीब केमिस्ट्री है न यह।
जहाँ धुआँ है वहाँ आग होगी ही, जहाँ उजास है वहाँ कहीं आस पास ही अन्धकार भी होगा। नैसर्गिक गुण धर्मों से लपलपाती ज्वालाएँ ऊर्जा की भण्डार है पर एक सत्य यह भी है कि लकड़ियाँ अपना उत्सर्ग कर के उन्हें उत्पन्न करती है। यह ऊष्मा कभी सूरज से इन्होंने ली थी, सहेजी थी। एक दिन चिंगारी आई और उठा कर ले गई। वैसे ही इस जिन्दगी ने कुछ पाया भी है और कुछ खोया भी।
उम्र की कहानी भी इसी तरह जीवन की कई विसंगतियों का अद्भुत रसायन है। हम चल रहे है, चल कर यहाँ तक आए हैं ओर चलते चलते अतीत के आइने में झाँक झाँक कर देखते रहते हैं। क्या थे और क्या हो गए? कहानी कहानी भी है और आईना भी है।
उजास में कुछ उजले चेहरे दिखाई देते हैं उन बगुलों की तरह जो उड़ते हुए सफेद दीखते हैं परन्तु झील के किनारे मछली की टोह में बैठे चितकबरे दिखाई पड़ते हैं। पेट की आग तो कुछ और तरह से भी बुझ सकती है पर छ्ल छ्द्म क्यों?
एक कहावत है कि "जीवन भर तेल फ़ुलेल लगाया पर अन्त में खुशबू नहीं आई। इन्सान की अंतिम परिणति एक मुट्ठी राख है उसे भी कोई संभाल कर नही रखेगा। लेकिन समय का घूमता चक्र जीवन भर पली बढ़ी भावनाओं को लील जाएगा। काल की गति को कौन जाने है। यह काल कभी वक्त कहलाता है तो कभी मृत्यु का देवता। दोनो ही स्वरूप प्रलयंकर है।
नाद की अनुगूँज में लय और प्रलय है, सृष्टि का सृजन भी है व विध्वंस भी है फिर भी क्रम और अनुक्रम है जारी है। उसमें ठहराव भी है और दोहराव भी है। कल्प भी है प्रकल्प भी है। वस्तुतः जिंदगानी धार बनकर लौट फिर आती है। जीवन वर्तुलाकार है। जीवन एक प्रमेय है, कुछ स्व साध्य है और शेष कर्म के मूल सिद्धान्तों में आबद्ध है। कहीं टूटी टूटी सी लगती है तो कहीं टूट कर जुड़ती है। सम्यक दृष्टि से जीवन समग्रता का दूसरा नाम है।

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