Friday, March 8, 2019

दृष्टा की दृष्टि सब मे है

निद्रावस्था में इन्द्रिय ज्ञान न रहने के कारण यद्यपि बाहर जगत का भौतिक ज्ञान विलुप्त हो जाता है पर चैतन्य की चेतना अर्थात् दृष्टा की दृष्टि बनी रहती है। अगर वह चैतन्यता विलुप्त हो जाती तो निद्रा से जगने पर यह किसको पता चलता है कि ” मैं सुख से सोया” –सुख से सोने का अनुभव ही सिद्ध करता है कि निद्रा के समय भी वह शक्ति विद्यमान रहती है जिसे सोने का अनुभव होता है, वह शक्ति ही दृष्टा की दृष्टि है जिसका कभी नाश नहीं होता। इस तथ्य को बृहदारण्यक श्रुति4×३×२३-30 तक के मंत्रों द्वारा स्पष्ट किया गया है —पश्यन् वै तत्र न पश्यति,जिघ्रन्,रसयन्,वदन्,श्रण्वन्,मन्वन्,स्पर्शन् विजानन् — वै न पश्यति,नजिघ्रति,नरसयते,न वदति,न श्रृणोति,नमनुते,न स्पृशति,न विजानाति नहि दृषटिविलेपे भवति अविनाशित्वात् – न तद्द्वितीयमस्तिततोsन्यत्विभक्त यत् पश्येत् –इत्यादि– उस निद्रावस्था में अन्य कोई न विद्यमान न रहने से प्राणी देखता हुवा,सूंघता हुवा,चखताहुवा,बोलता हुवा,सुनताहुवा,मननकरता हुवा,स्पर्श करताहुवा और जानता हुवा भी नहींनहीं देखता, नहीं सूँघता, नहींचखता, नहींबोलता, नहींसुनता,नहींस्पर्श करता, तथा नहीं जानता है। सारांश यह है कि नींद में यद्यपि चैतन्यता बनी रहने के कारण इन्द्रियों व मन की समस्त क्रियाओं की वास्तव में विद्यमानता रहते हुवे भी बाहरी उपकरणों (इन्द्रियें) की क्रिया न होने के कारणचैतन्यता विलुप्त हुई सी जान पङती है परन्तु वास्तव में वह दृष्टा की दृष्टि हमेशा बनी रहती है — उसका कभी लोप नहीं होता है।
इसके अलावा जिस प्रकार सूर्य से उसकी नैसर्गिक स्वाभाविक उष्णता अलग नहीं की जा सकती, उसी प्रकार चेतन दृष्टा स्वयम् ज्योति होने से उसकीचैतन्य दृष्टि उससे अभिन्न होने के कारण कभी भी अलग नहीं की जा सकती– तथा आत्मा चैतन्य नित्य होने से उसकी दृष्टि भी नित्य रहती है।
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यथा स्वप्ने द्वयाभासं स्पन्दते मायया मन:, तथा जाग्रत् द्वयाभासं स्पन्दते मायया मन:।—मांडूक्य कारिका । २९।
मानव स्वप्न में अनेक प्रकार के द्रश्य,देखता है, अनेक लोगों से वार्तालाप करता है व स्वप्न में ही कल्पनाएँ भी करता है देश विदेश घूमता है परन्तु न तो उस समय उसके देखे द्रश्य ही यथार्थ होते है, न उसके सिवाय अन्य को ई मानव ही होता है,न देश विदेश में उसके विचरण किये स्थान ही सत्य होते हैं । उस समय केवल मात्र उसका चित्त व चित्त की स्पन्दना ही नाना रूपों में भासती है । —अर्थात् उसकी चित्त की स्फुरणा एकमात्र होते हुवे भी नानात्व भासता है जो जागनेपर मिथ्या मालूम पङ जाता है । जाग्रत अवस्था में भी मानव चित्त से ही अनेक द्रश्य देखता है, वार्तालाप करता है देश देशान्तर जाकर वहां के स्थान दे खता है। इस जाग्रत अवस्थाा में भी वही चित्त व वही चित्त की स्फुरण के माध्यम से ही सब अनुभव प्राप्त करता है।sस्वप्न तथा जाग्रत –दोनों अवस्थाओं में अनुभव करने वाला एक ही चित्त होता है। व जिस चित की वृत्ति रूपी हथियार से अनुभव प्राप्त किया जाता है वह भी एक ही है –फिर क्या कारण है कि स्वप्न के अनुभव को तो मिथ्या व जाग्रत के अनुभव को सत्य माना जाय । जिस प्रकार जाग्रत में हम अपने अनुभव को सच्चा मानते हैं, उसी परकार स्वप्न के समय स्वप्न का ही कोई दूसरा प्रतीत होने वाला पुरूष स्वप्न दृष्टा को स्वप्न में कहे कि तुम अभी स्वप्न में हो और जो अनुभव कर रहे हो वह मिथ्याा है, — तो स्वप्नदृष्टा उसकी बात न मानकर अपने स्वप्न के अनुभव को स्वप्न के समय सत्य ही मानेगा,— उसी प्रकार जाग्रत में भी तत्त्व दृष्टा के द्वारा जाग्रत के अनुभवोंं व नानात्व दर्शन को मिथ्या बतलाने पर भी वह सच्चा लगता है। किसी सद्गुरु की कृपा से जब हम अज्ञान अवस्था में इस जाग्रत रूपी रूपी स्वप्न से जागकर ज्ञान रूपी जाग्रत अवस्था को प्राप्त कर सकेंगे तभी इस जाग्रत अवस्था में भी द्वैत अर्थात् नानात्व का दर्शन समाप्त होकर संपूर्ण सृष्टि में एकमात्र परब्रह्म का दर्शन होने लगेगा।

रामनारायण सोनी

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