चित्तं न संस्पृशत्यर्थं नार्थाभासं तथैव च ।
अभूतो हि यतश्चार्थो नार्थाभासस्ततः पृथक् ॥
निमित्तं न सदा चित्तं संस्पृशत्यध्वसु त्रिषु ।
अनिमित्तो विपर्यासः कथं तस्य भविष्यति ॥
(माण्डूक्यकारिका - अलातशांति प्रकरण - २६-२७)
चित्त (कभी) किसी पदार्थ का स्पर्श नहीं करता और इसी प्रकार न किसी अर्थाभास का ही ग्रहण करता है क्योंकि पदार्थ तो है ही नहीं, इसलिए पदार्थाभास भी उस चित्त से पृथक नहीं है । (भूत,भविष्य और वर्तमान) तीनों अवस्थाओं (कालों) में चित्त कभी किसी बिषय को स्पर्श नहीं करता फिर उसे बिना निमित्त के ही विपरीत ज्ञान कैसे हो सकता है ?
इन्द्रियेभ्यः परा ह्यर्था अर्थेभ्यश्च परं मनः । मनसस्तु परा बुद्धिर्बुद्धेरात्मा महान्परः ॥
महत: परमव्यक्तमव्यक्तात् पुरुष: पर:।
पुरुषान्न परं किञ्चित्सा काष्ठा सा परा गति: ॥ (कठोपनिषद् - १/३/१०-११)
इन्द्रियों से श्रेष्ठ शब्दादि विषय हैं, विषयों से श्रेष्ठ मन है, मन से श्रेष्ठ बुध्दि और बुध्दि से भी अत्यन्त श्रेष्ठ और बलवान महान् आत्मा है । उस आत्मा से भी बलवती परमेश्वर की माया शक्ति (आदिशक्ति) है और उस माया शक्ति से भी श्रेष्ठ व परे वह परम ब्रह्म परमेश्वर है जिससे श्रेष्ठ और बलवान कुछ भी और कोई भी नहीं है। वही सबका (श्रेष्ठ समय) परम अवधि और वही सबकी (श्रेष्ठ) परम गति है ।
अत्रैष देवः स्वप्ने महिमानमनुभवति ।
यद्दृष्टं दृष्टमनुपश्यति ।
श्रुतं श्रुतमेवार्थमनुशृणोति ।
देशदिगन्तरैश्च प्रत्यनुभूतं पुनः पुनः प्रत्यनुभवति ।
दृष्टं चादृष्टं च श्रुतं चाश्रुतं चानुभूतं चाननुभूतं च
सच्चासच्च सर्वं पश्यति ।
सर्वः पश्यति ॥
इस स्वप्नावस्था में यह देव अपनी विभूति का अनुभव करता है। इसके द्वारा (जाग्रत-अवस्था में) जो देखा हुआ होता है उस देखे हुए को ही यह देखता है, सुनी-सुनी बातों को ही सुनता है तथा दिशा-विदिशाओं में अनुभव किये हुए को ही पुनः-पुनः अनुभव करता है। यह देखे, बिना देखे, सुने, बिना अनुभव किये तथा सत और असत सभी प्रकार के पदार्थों को देखता है और स्वयं भी सर्वरूप होकर देखता है।
भोगार्थं सृष्टिरित्यन्ये क्रीडार्थमिति चापरे ।
देवस्यैष स्वभावोऽयमाप्तकामस्य का स्पृहा ॥
कुछ लोग 'सृष्टि भोग के लिये है' ऐसा मानते हैं और कुछ 'क्रीडा के लिये है' ऐसा समझते हैं। (परंतु वास्तव मे तो) यह भगवान का स्वभाव ही है क्योंकि पूर्ण काम को इच्छा ही क्या हो सकती है?
स यो ह वै तत् परमं ब्रह्म वेद
ब्रह्मैव भवति नास्याब्रह्मवित् कुले भवति ।
तरति शोकं तरति पाप्मानं
गुहाग्रन्थिभ्यो विमुक्तोऽमृतो भवति ॥
निश्चय ही जो कोई भी उस परमब्रह्म परमात्मा को जान लेता है वह महात्मा ब्रह्म ही हो जाता है । इसके कुल में ब्रह्म को न जानने वाला नहीं होता । (वह) शोक से पार हो जाता है, पाप समुदाय से तर जाता है, हृदय की गाँठों से सर्वथा छूटकर अमर हो जाता है ।
मनसैवेदमाप्तव्यं नेह नानाऽस्ति किंचन ।
मृत्योः स मृत्युं गच्छति य इह नानेव पश्यति ॥
(शुद्ध) मन से ही यह परमात्म तत्व प्राप्त किए जाने योग्य है । इस जगत में (एक परमात्मा के अतिरिक्त) भिन्न कुछ भी नहीं है । (इसलिए) जो इस जगत में भिन्न भाव से (भेद दृष्टि से) देखता है, वह मनुष्य मृत्यु से मृत्यु को प्राप्त होता है । (अर्थात बार-बार जन्मता- मरता रहता है ।)
यदा न लीयते चित्तं न च विक्षिप्यते पुनः ।
अनिङ्गनमनाभासं निष्पन्नं ब्रह्म तत्तदा ॥
जिस समय चित्त सुषुप्ति में लीन न हो और फिर विक्षिप्त भी न हो तथा निश्चल और बिषयाभास से रहित हो जाय उस समय वह ब्रह्म ही हो जाता है ।
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निद्रा में स्वप्न आते है अर्थात निन्द्रा के टूटने से जाग्रति होती है। थका हुआ देह हो तब आ जाती है निद्रा। सारी दुनिया की चिंतायें अस्त हो जाती है निद्रा में। जाग्रत व स्वप्न में प्रकाशक है आत्मा।
अद्वयं च द्वयाभासं मनः स्वप्ने न संशयः ।
अद्वयं च द्वयाभासं तथा जाग्रन्न संशयः ॥ ३० ॥
यथा स्वप्ने द्वयाभासं चित्तं चलति मायया ।
तथा जाग्रद्द्वयाभासं चित्तं चलति मायया ॥ ६१ ॥
अद्वयं च द्वयाभासं चित्तं स्वप्ने न संशयः ।
अद्वयं च द्वयाभासं तथा जाग्रन्न संशयः ॥ ६२ ॥
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निगद्यतेन्तःकरणं मनोधीः
अहंकृतिश्चित्तमिति स्ववृत्तिभिः ।
मनस्तु संकल्पविकल्पनादिभिः
बुद्धिः पदार्थाध्यवसायधर्मतः ॥
(विवेक चूड़ामणि - ९३)
अपनी वृत्तियों के कारण अंतःकरण - मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार (इन चार) नामों से जाना जाता है। संकल्प विकल्प के करण 'मन', पदार्थों का निश्चय करने के कारण 'बुद्धि', मैं - मैं (अहम् - अहम्) ऐसा अभिमान करने के कारण 'अहंकार' और अपना इष्ट चिंतन करने के कारण 'चित्त' कहलाता है।
The inner organ is called Manas, Buddhi, ego or Chitta, according to their respective functions. Manas, from its considering the pros and cons of a thing, Buddhi, from its property of determining the truth of objects, the ego, from its identification with this body as one’s own self and Chitta, from its function of remembering things it is interested in.
अत्राभिमानादहमित्यहंकृतिः ।
स्वार्थानुसंधानगुणेन चित्तम् ॥
(विवेक चूड़ामणि - ९४)
अपने विकारों के कारण स्वर्ण, जल आदि के समान स्वयं प्राण ही वृत्ति भेद के कारण प्राण, अपान, व्यान, उदान और समान इन पांच नामों से जाना जाता है।
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