भाषा एक सेतु है, शब्द उसकी शक्ति है। भाषा इस से बने संवाद के संचार और विचारों के विनिमय का माध्यम है। भाषा बुद्धि और तर्क का हथियार है। भाषा विचारों और प्रश्नोत्तरों की उर्वरा भूमि है। भाषा केवल शब्दों के माध्यम से ही नहीं सकेतों के माध्यम से भी संचार सेतु का निर्माण करने का सामर्थ्य रखती है। संवाद अपरिचित को परिचित बनाता है, परिचितों को निकट लाता है और निकट आये व्यक्तियों को अन्तरंग करने के काम आता है। सभी निकट आये व्यक्ति अन्तरंग नहीं हो पाते लेकिन जो अन्तरंग हो गया उन्हें फिर इन सेतुओं की आवश्यकता नहीं होती। वह बिना जोड़ का जोड़ है। अन्तरंग होना प्रेम का प्रथम सोपान है। प्रेम की भाषा "मौन" है। प्रेम जब गहराता है तब शब्द व्यर्थ हो जाते हैं। वहाँ शब्दों की आवश्यकता नहीं, संवादों की भी कोई आवश्यकता नहीं। वहाँ न कोई संकल्प की जरूरत है न ही किसी विकल्प की। मौन आकाश की तरह विशाल और सागर के अन्तस्थल की तरह शान्त होता है इसलिये प्रेम का साम्राज्य भी विशाल और चिर शान्ति लिये होता है। इसीलिये प्रेमी मौन हो जाते हैं। भाषा खो जाती है। तब मौन स्वयं अपने आप में ही संवाद होगा। उनका यह संवाद अतर्क्य है। बुद्धि दरवाजे के बाहर ही खड़ी रह जाती है। प्रेमी अस्तित्व के एक विशिष्ट आयाम के साथ लयबद्ध हो जाते हैं। वे इसे प्रमाणित नहीं कर सकते क्योंकि प्रेम एक दिव्य अनुभूति है। प्रेम में दो तन के उस पार दो मन एक हो जाते हैं। यह केवल दो शरीरों के एक होने की बात है ही नहीं। गणित में एक और एक दो होते हैं, सामाजिक सरोकार में एक और एक ग्यारह होते हैं लेकिन प्रेम के संबंध में एक और एक केवल एक ही होता है। यह दो आत्माओं का विशुद्ध मिलन है।*
Friday, June 21, 2019
प्रेम की भाषा "मौन" है
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