प्रकृति बहुत दृढ़ निश्चयी होती है वह हमारे सोचने के अनुरूप नहीं चलती।
नैव किंचित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित्।
पश्यन् श्रृणवन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्गच्छन्स्वपन् श्वसन्।।
5.8 श्रीमद्भगवद्गीता।।
योगी वह है जो देखता सुनता छूता सूँघता खाता चलता ग्रहण करता बोलता त्याग करता सोता श्वास लेता तथा आँखें खोलता और मूँदता हुआ भी सम्पूर्ण इन्द्रियाँ इन्द्रियोंके विषयों में बरत रही हैं ऐसा समझकर मैं कुछ भी नहीं करता हूँ ऐसा मानता है। इससे यह स्पष्ट है कि ये सभी क्रियाएँ हैं और प्रत्येक क्रिया कर्मफल बनाती ही है। वस्तुतः प्रकृति हमारे हर कर्म को परिणामों में बदल देती है। स्वभावतः हमारे कर्मों के परिणाम का हम बहुत दूर तक अन्दाजा नहीं लगा पाते हैं और जब वे सामने आते हैं तो हमारे हाथ में कुछ नहीं बचता। कर्म का सिद्धान्त केवल क्रिया जनित नहीं है वरन् हमारे शब्द भी, हमारे विचार भी और जो जो भी हमारे क्रिया कलाप होते हैं परिणामी होते हैं। हमें अपने हर शब्द को बोलने से पहले अवेयर होना बहुत ज़रूरी है अन्यथा उसके दुष्परिणाम स्वयं को भुगतने पड़ते हैं और वे अपने पूरे परिवेश को प्रभावित करते रहते हैं। इसलिए शब्दों का प्रयोग करने से पहले सावधान हो जाओ। शब्दों की शक्तियॉ अनन्त हैं।
Wednesday, June 19, 2019
सारे कर्म परिणामी हैं
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डॉ मुरलीधर चाँदनी वाला
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