आज का मौलिक चिन्तन
बात वैरागी जी की लिखी दो पंक्तियों से करता हूँ। मन में प्रश्न उठता है कि क्या सृजन के लिए विध्वंस होना जरूरी है। क्या विध्वंस किसी की हानि या खत्म किये जाने की प्रक्रिया है। क्या विध्वंस सृजन का सोपान है? प्रश्न कई हैं पर उत्तर सम्यक विचार और उसकी सकारात्मकता विषय को रोचक बनाती है। बात विध्वंस से बिखराव पर होते हुए सृजन तक जाती है जिसका फलादेश आनन्द है
*बिखर कर फैल जाने का अलग आनन्द होता है*
*समीरन में घुला सौरभ ही महकी गन्ध होता है*
डॉ जय वैरागी, झाबुआ
निर्माण के लिये एक विध्वंस होना नैसर्गिक प्रक्रिया है। विध्वंस का अर्थ नष्ट होना नही है। ईंटें बनाने के लिए मिट्टी का बिखरना, बिखर कर जमना जरूरी है, सीमेंट के लिये पत्थर का बिखरना, रांगोली के लिये रंगों का बिखरना, मेघों से बूँदों का बिखरना, सितार के तारों के कंपन हवा में बिखरना और पुष्प के पुंकेसर से सुगन्ध का *"बिखरना"* जरूरी है। एक स्वरूप का विध्वंस दूसरे स्वरूप के निर्माण की तैयारी है। इस बिखराव से सृजन के सुख का होना ही आनन्द है पर आनन्द का उद्घोष तभी होगा जब इस बिखराव में एक लय हो, एक अनुशासन हो, एक संगत हो, एक सर्मपण हो। बिखर कर फैल जाना अपने आप में एक विस्तार है। सूक्ष्मातिसूक्ष्म वृक्ष तो बीज में से फैला वृक्ष का सम्यक साकारत्व है। प्रकृति की असीम शक्ति से बीज में से वृक्ष का अनुशासित प्रस्फुटन भी बिखरना ही तो है, इस बिखराव का विस्तार ही वृक्ष की अभिव्यक्ति है। यह वृक्ष स्वयं प्रकृति में आनन्द का उद्घोष है। परागकणों का हवा में बिखराव सौरभ का अर्थात् आनन्द का सम्यक विस्तार है।
रामनारायण सोनी
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