आज़ाद रिश्तों में हम बंधन ढूँढते हैं और बंधे रिश्तों से आज़ादी चाहते है, है न बड़े आश्चर्य की बात? लेकिन जंजीरों से मोहब्बत रखने वालों को कोई आज़ाद नहीं कर सकता। सीमाएँ आजादी के दायरे निश्चित करती है पर आजादी सीमाओं की पर्वाह नही करती। एक बात और है कि धुंध के आवरण में आजादी और सीमाएँ दोनों का पता नहीं चलता। इस सर्च में अपना मैं खो बैठते हैं।
"ढूँढने बैठा स्वयं को
आ गया हूँ मैं कहाँ तक।" (डॉ जय वैरागी)
यह मनोयोग नहीं मनोदशा है, भटकन है, न यह सीमा ढूँढता है न आज़ादी। यह छ्द्म आवरण है। दर्पण पर गर्द चढ़ जाने से न मैं छुपता हूँ न मेरा प्रतिबिंब अपितु दोनों ही सिर्फ आवरण के बीच में आने से अनभिव्यक्त है। आवरण के हटते ही दृष्टि की सीमाएँ समाप्त हो जावेंगी। मैं और मेरा प्रतिविंब आज़ाद हो जावेंगे। जिन्हें हम सीमा समझ बैठे है असल में वे सब आवरण ही हैं। मैं मुझमें ही मौजूद हूँ पर ढूँढने के लिये बाहर जाता हूँ लेकिन बाहर कहीं तक भी चला जाऊँ मुझे मैं नहीं मिलूँगा। यही आवरण मुझे भीतर जाने नही देता। मैं बाहरी रिश्तों से आजादी चाहता हूँ पर भीतर के आज़ाद रिश्ते से बेखबर घूम रहा हूँ।
हम बाहर के बन्धन स्वीकारते हैं पर भीतर के आज़ाद रिश्ते नहीं पकड़ते।
रामनारायण सोनी
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