मौन की गहराइयाँ
गुनगुना रही है
नेपथ्य से
पदचापों के आलाप
तैरते गूँजे मुखर स्वर
बाँधे पगों में अपने
झुनइुनाते घूँघरू
आरूढ़ हवा के परों पर
मन के द्वारे
दस्तक दी किसने
रेडियो की संवाही तरंगें
दिखती कहाँ है
काँधे पर टिका सर
नही है, पर है
एहसासों ने बना लिया
तिलिस्मी एक आशियाना
रेतीले इस सेहरा में
गुलाबों की खुशबुएँ
कुछ पता नहीं!
यह इबादत है या इश्क
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