Tuesday, September 3, 2019

सेहरा में गुलाब

मौन की गहराइयाँ
गुनगुना रही है
नेपथ्य से
पदचापों के आलाप

तैरते गूँजे मुखर स्वर
बाँधे पगों में अपने
झुनइुनाते घूँघरू
आरूढ़ हवा के परों पर

मन के द्वारे
दस्तक दी किसने
रेडियो की संवाही तरंगें
दिखती कहाँ है

काँधे पर टिका सर
नही है, पर है
एहसासों ने बना लिया
तिलिस्मी एक आशियाना

रेतीले इस सेहरा में
गुलाबों की खुशबुएँ
कुछ पता नहीं!
यह इबादत है या इश्क

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