"जुड़ना और जुड़ कर टूटना" नियति की विद्रूप तूलिका से निर्मित आकार जीवन में किसी ज्वालामुखी के बिखरे लावा से कम नहीं है। जलते लावा को कोई नहीं छूता अलबत्ता लोग समझाएँगे कि इससे दूर रहें। लेकिन नियति ने इस विध्वंस में एक सृजन छिपा रखा है वह है अप्रतिम ऊर्जा की रश्मियाँ अर्थात् अप्रतिम उर्वरा। साहस और कर्म के बीज बोने की क्षमता तो खुद में स्थापित करना होगी। एक बात तो तय समझें कि जो उर्वरा ठण्डे हुए लावा में है वह साधारण मिट्टी में नहीं। पर जरूरत है उर्वरा के सदुपयोग करने की।
आपकी बोई फसल काटने पूरा गाँव आएगा। तब आपको जीवन में असीम सुख और आनन्द की अनुभूति हुई होगी कि ईश्वर ने आपमें "देने" की क्षमता समाहित कर दी है। यह क्षमता आपके मन में कई संभावनाओं का सृजन करती हैं।
संघर्ष के बिना जीवन का सोंदर्य पाना असंभव है। संघर्ष के साथ जुड़ा है अवसाद, आत्महीनता, घृणा, पलायन और तितिक्षा। इस प्रबल झंझा में खड़ा रखने वाला केवल एक ही संबल है वह है आपका आत्मविश्वास। अपने कर्मों का बीज बोना और धीरतापूर्ण फसल पकने की प्रतीक्षा करना अनिवार्य है। कच्चे फल मत तोड़ बैठना। आपकी सफलता उतनी ही चमकदार है जितना तीव्र आपका संघर्ष है।
यह आध्यात्मिक दृष्टिकोण से देखें तो पावेंगे-
सुषारथि अश्वानिव यन्मनुष्यान नेनीयते अभिषुभिर्वाजिन इव।
हृत प्रतिष्ठं यदजीरं जविष्ठं तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु ।। यजुर्वेद ३४/६
जिस प्रकार उत्तम सारथि घोड़ो को लगाम से साध कर भलीभांति चलाता है | उसी प्रकार हमारा मन जो अतयंत फुर्तीला और वेगवान है, हमारे जीवन को चलाता है। हे ईश्वर मेरा मन शुभ संकल्पों वाला हो।
संघर्षों के क्षणों में आपके संकल्प में मन में शिवत्व न हो तो बड़ा विध्वंस प्रस्तुत हो जाता है। मन को नियंत्रित करती है बुद्धि। इसलिए भागवत कहती है--सत्यं परं धीमहि। और बुद्धिर्यस्य बलं तस्य।
मेरी वैदिक शुभकामना है--
येन कर्माण्यपसो मनीषिणो यज्ञे कृण्वन्ति विदथेषु धीराः।
यद्पूर्वं यक्ष्मन्तः प्रजानां तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु। यजुर्वेद ३४/२
जिस मन से कर्मठ और धीर विद्वान लोग अपने सब शुभ कर्म करते हैं।
जो अपूर्व और पूज्य मन सबके अन्दर है। वह मन शुभ विचारों वाला हो।
निवेदक
रामनारायण सोनी
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