मेरे प्रिय आत्मन्!
मैं शाजापुर जिले के एक छोटे से गाँव मकोड़ी में जन्मा हूँ। मैं भाग्यशाली हूँ कि मेरा परिवार आध्यात्मिक भावनाओं और विचारों से लबरेज था। तत्कालीन ठेठ गाँव का परिवेश और उसमें रचे बसे सुरम्य ग्राम्य जीवन की मनमोहक छटा की याद सचमुच मुझे आज भी गुदगुदाती है।
प्रकृति की गोद में खेलता जीवन और चारों दिशाओं से आम्रकुंजों से घिरे हुए गाँव की छबि आज तक मेरे मन में बसी हुई है।
मेरी दादी सूरज बाई अौर माँ दरियाव बाई रात्रि के अन्तिम प्रहर में उठ कर चक्की पीसते हुए समवेत स्वर में पारंपरिक प्रभाती और भजन गाती थी जिनके भावों को लेते हुए कुछ रचनाएँ अपने काव्य संग्रह में परिलक्षित होती है तथा उन संचित भावों का आध्यात्मिक प्रभाव मेरे जीवन सदैव रहा है।
यद्यपि मैं विज्ञान का विद्यार्थी था फिर भी मेरी हायर सेकण्डरी स्तरीय शिक्षा में मैने मैथिलीशरण गुप्त, महादेवी वर्मा, निराला, प्रसाद, आचार्य चतुरसेन, वृन्दावनलाल वर्मा आदि कवियों, लेखकों के साहित्य को बड़े मनोयोग से पढ़ा। तब मैं डायरी लिखता रहता था। इसके बाद मैंने इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में स्नातक किया। इसके पश्चात् म.प्र.वि.मं. में विभिन्न इंजीनियरिंग पदस्थापनाओं पर कार्यरत रहा। मुझे दो बार अतिविशिष्ट सेवाओं के लिए विशेष अवार्ड मिले।
सन् २००६ में सेवा निवृत्ति के पश्चात् २०१२ तक मुझे विद्युत वितरण कम्पनी इदौर में पुनर्नियुक्ति मिलती रही। इस दौरान मैंने सोशियो-टेक्नीकल और "टेक्नीकल कम रेवेन्यू एनालिसिस" के शोध कार्य किये जो मेरे द्वारा एकल प्रयास से स्थापित एम.आर.डी.एम. सेल के रूप में कार्यशील है। यह मेरे जीवन का सब से सुनहरा तकनीकी काल था। जो मेरे मन का एक परितोष प्रदान करता है।
सन् २०१२ में मेरे जीवन की तीसरी पारी शुरू हुई। फिर मुझे लगा कि हम जीवन भर समाज से किसी न किसी रूप में कुछ न कुछ लेते रहते हैं तो हमारा कर्तव्य बनता है कि हम किसी न किसी रूप में समाज को लौटावें। सोशियो-टेक्नीकल एरिया में मैने कुछ शोध किए थे कि टेक्नोलोजी सिर्फ विकास और राजस्व अर्जन की बात न करे अपितु समग्र प्रयास जनता की परेशानियों को कम करे और सेवा करने वाली एजेन्सी को नुकसान भी न हो। कुछ प्रयोग बहुत सफल भी रहे। जैसे कि ईमानदार उपभोक्ता को परेशानी न हो लेकिन विद्युत चोरी करने वालों पर शिकंजा कसा जाय अन्यथा इनके चुराए राजस्व की भरपाई ईमानदारों को करना पड़ती है। इन विषयों का स्पेशलाइजेशन होने से विद्युत वित. कम्पनी में भर्ती होने वाले लगभग सभी बेच में ट्रेनिंग प्रदान करने का कार्य २००६ से अद्यतन जारी है। विश्वविद्यालय स्तर पर "स्मार्टग्रिड" जैसे अत्याधुनिक विषय पर सेमीनार एड्रेस करने का सौभाग्य भी मिलता है।
ईश्वर की अनुकम्पा से अब तीसरी पारी में साहित्य के पड़े वे बीज पुनः अंकुरित होने लगे। सन २०१३ में मेरी प्रथम पुस्तक "पिंजर प्रेम प्रकासिया" अौर २०१५ में "जीवन संजीवनी" प्रकाशित हुई। ये कृतियाँ गद्यात्मक हैं। सन् २०१५ में एक सुखद संयोग हुअा कि मैं "रोटरी काव्यमञ्च" अौर "इन्सा, इन्दौर चेप्टर, इन्दौर" से जुड़ा जहाँ प्रबुद्ध वरिष्ट रचना धर्मियों का सानिध्य, प्रोत्साहन तथा मार्गदर्शन मिला। युगपुरुष स्वामी परमानन्द गिरी जी महाराज ने असीम अनुकम्पा कर मुझे दीक्षा प्रदान है। स्वामी प्रबुद्धानन्द सरस्वती, चिन्मय मिशन इन्दौर का आशीर्वाद औपनिषदेय चिन्तन के रूप में मिलता रहा है। डॉ कीर्ति स्वरूप रावत अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के सुविख्यात लेखक और शोध प्रदर्शक का आशीष मुझे मिलता ही रहता है। स्पष्ट है मेरे पास जो कुछ निसर्ग होता है उसके मूल तात्विक स्वरूप इन्हीं श्रेष्ठिय जनों का प्रदत्त प्रसाद होता है। इसके अतिरिक्त प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष में वे लोग हैं जो मेरे इस प्रयास में सहभागी रहे हैं, मैं अभिभूत हूँ और उनका कृतज्ञ हूँ।
जब भाव गहराते हैं तो शब्द नहीं मिलते और शब्द ढूँढते ढूँढते भावों की श्रृंखला बिखर जाती है लेकिन इन दोनों का मेल कभी कभी कुछ पलों के लिये हो जाता है तो साहित्य सृजित हो जाता है, कविता जन्म ले लेती है। मेरे साहित्यिक गुरु डॉ रमेश सोनी का कहना है कि कविता की नहीं जाती है वह तो हो जाती है। और कविता तुम्हारे माध्यम से खुद को लिखवा लेगी। उन्होंने एक प्रयोग और करने की भी सीख दी थी कि शब्दों में भाव पिरोने के बजाय भावों को शब्दों में निरूपित करने का प्रयास करें।
मेरे काव्य संग्रह की मूलाधार ये पंक्तियाँ देखें -
जैसे नेपथ्य से उभर कर आई,
किसी अनजान पवित्र रूह ने
अन्तस में इस तरह गुनगुनाई
कि मैं अभिभूत हो गाने लगा
मित्रों! जब मैं लिखता हूँ..
तो मैं नही
कोई और ही लिखता है
मुझे बस तसल्ली है..
...कि मैं लिखता हूँ।
वो ही आता है बस
कलम पर बैठ जाता है
मन की सीढ़ी पर
वो ही चढ़ जाता है।
भावों के दरिया में..
..रंग घोल घोल जाता है।
मुझे बस तसल्ली है..
...कि मैं लिखता हूँ
मेरे संकलन में कुछ अटपटी, लटपटी कविताएँ संग्रहित हैं। जब जब जो जो मन में आया लिख लिया। कविता की शास्त्रीयता, छन्द विन्यास, गीत, रस-अलंकार का मैं जानकार नहीं हूँ इसका आभास पाठक को जहाँ-तहाँ हो जाएगा। इस संकलन में सन् १९८५ से अद्यतन रचनाएँ सम्मिलित हैं।
जिन्दगी के आयाम अनन्त हैं। किंचिद् भावनाओं के रंग कलम की कूँची में पड़ गए और पृष्ठों के कैनवास पर सहज में उतर आए हैं इसलिए कदाचित् काव्य कलात्मकता का अभाव खल सकता है।
मैं थोड़ा थोड़ा प्रयोगधर्मी भी रहा हूँ। टेकनीकलिटि का उपयोग जहाँ तहाँ करता रहता हूँ। किसी अन्य की कविता अच्छी लगे तो मैं उसका इलस्ट्रेशन तैयार करता हूँ। उनकी लिखी इबारत की टीका सिर्फ इसलिये करता हूँ कि उनके सृजन को समझ सकूँ इसलिये नहीं कि उनकी निन्दा करूँ। मन करता है कि किसी की अच्छी रचनाओं का वीडियो बना कर यू-ट्यूब पर प्रकाशित करूँ। कोई अपनी रचना गाये तो उसे और सजा दूँ, जन्मजात स्वर्णकार जो हूँ। लोग अपनी रचनाओं का ब्लॉग आदि पर संग्रहण करे, इसमें मैं सहायता करता हूँ। मेरी पुस्तक "जीवन संजीवनी का प्रकाशन अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के इलेक्ट्रॉनिक मीडिया "किंडल" पर हो चुका है।
अपने सेवा काल में प्रत्यक्ष देखे गए सामाजिक, मानवीय सुख-दुःख, पीड़ा, करुणा, पर्यावरणीय परिवेश अौर उनकी अनुभूत संवेदनाओं के कुछ पलों की अभिव्यक्ति किंचिद् रचनाओं में झाँकती नजर आएगी।
"जिन्दगी के कैनवास" में संकलित नायिका प्रधान रचनाओं की भावात्मक पृष्ठभूमि मेरी सहधर्मिणी श्रीमति शकुन्तला सोनी की हैं जिनके शब्द मैंने दिए हैं। उनकी इस सहभागिता पर मैं गर्वित हूँ।
यहाँ इस बात का उल्लेख करना चाहूँगा कि वाट्सएप ग्रुप "शब्द-धरा वनांचल" के सदस्य डॉ जय वैरागी, डॉ सीमा शाहजी, श्रीमति भारती सोनी, श्री धर्यशील येवले जी ने मेरी काव्य यात्रा में प्रोत्साहन और मार्गदर्शन का कार्य किया है। मैं उनका भी हृदय से आभारी हूँ। उनके इस कार्य से मैं अनुग्रहीत अौर उपकृत हूँ।
रामनारायण सोनी
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