*नव सृजन नव चेतना का*
*जब कभी आगाज़ होगा*
*ठूंठ में नव कोपलों से*
*फिर नया मधुमास होगा*
डॉ जय वैरागी
कोई कहता है बसन्त के बाद ग्रीष्म आती है, कोई कहता है बसन्त बरस में एक ही बार आती है तो कोई कहता है शिशिर के बाद बसन्त आती ही है, पतझड़ के बाद बसन्त आती ही है। जो पतझड़ के बाद बसन्त को अवश्यंभावी समझता है सृजन की सामर्थ्य केवल उसी में है। वह ठूँठ में से नवपल्लव उगाता है। मैने देखा है, यह सत्य घटना है - किसान के नींबू के खेत में कोई पेड़ को जमीन के ६ इन्च ऊपर से काट गया। वह मन मसोस कर रह गया। कुछ दिन बाद उसने उस ठूँठ में नींबू की एक कलम लगा दी। समय आने पर उस में अंकुर फूट आये। दो बरस बाद उसमें फल आने शुरू हो गए।
वास्तव में कोंपलों का सृजन मधुमास के गढ़ने की तैयारी है। नव चेतना का आह्वान बीज में से अंकुरण का आह्वान है वही द्वार खोलता है पौधे के नव सृजन का। नव चेतना का आह्वान कलिका के फूटने से फूल के सृजन की तैयारी है। नव चेतना कठोर चट्टानों में से सोता फूटने पर झरने के सृजन का आगाज है। जब जब ऐसे आगाज़ अंजाम पाएँगे वे जड़त्व में चेतना लाएँगे। चेतना का सर्व श्रेष्ठ गुण है विकास और विकास के बिना सृजन अकल्पनीय है। मधुमास भी चेतना के माध्यम से विकास है, प्रकृति का सृजन है। प्रकृति की सृजन प्रक्रिया जीवन की संचेतना है।
*"सृजन और विध्वंस के मैं*
*गीत युग से गा रहा हूँ*
*बह रही धारा के संग संग*
*मै भी बहता जा रहा हूँ"*
यदि अन्यथा न लिया जाए तो परमाणु बम के विस्फोट के पूर्व और बाद के जापान की तुलना कर.के देखिये। वहाँ पर ठूँठ में कोंपल उगाने की क्षमता नहीं पैदा की होती तो वह देश मर ही जाता। उसने नव चेतना का आह्वान न किया होता तो नव सृजन भी अकल्पनीय होता। डॉ जय वैरागी की ये पंक्तियाँ आपके भीतर संन्निहित चेतना का आह्वान कर नव सृजन के लिये आमन्त्रित कर रही है।
इसलिये बसन्त के बाद के ग्रीष्म की प्रकल्पना छोड़िये, पतझड़ के बाद के बसन्त होने की नव चेतना का आगाज़ कीजिये। अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाली नव चेतना का आह्वान कीजिये।
असतो मा सद्गमय
तमसो मा ज्योतिर्गमय
मृत्योर्मामृतं गमय
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