*मौलिक लघु चिन्तन!
अज्ञान तो एक क्षितिज की तरह है। लगता
है आकाश यहीं तक है। परन्तु वृहद आकाश
तो क्षितिज के छोर से ही प्रारंभ होता है।
अज्ञान के अन्तिम छोर पर ज्ञान खड़ा है। मेंढक
का कुए में इस छोर से उस छोर तक की
छलाँग धरती की नाप नहीं है पर कुआँ जब
धरातल तक भर जाएगा तब मेंढक को धरती
और आकाश सहित समष्टि के दर्शन होंगे।
यह वर्षा के प्रताप से संभव होगा। गुरु का
आशीष ही ज्ञान की वर्षा है जो सीमित से
विराट की, व्यष्टि और समष्टि की पहचान
कराएगी। अज्ञान का बोध ही समयक् ज्ञान
का द्वार है।
तो चलो क्षितिज के उस पार चलें।
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