समीक्षा १४
नव गीत
तुम्हारी अनछुई सम्वेदनाओ के कथानक में ।
मेरी सम्वेदनाओं के सभी प्रतिमान ठहरे है ।।
छुई जब भावनाए उस तपन में नित्य झुलसा हूँ
गुँथे जब व्यूह शब्दों के उन्ही में नित्य उलझा हूँ
मुखर जब शब्द जागे है वे सब नव राह बुनते हैं
अगर जागी पराई वेदना नव थाह गुनते है।
कभी सींचा द्रुमों को आज उपवन छंद लगते है।
कथानक के समर्पण में मधुमय गन्ध लगते है।।
ध्वनि गर कण्ठ से निकली समाहित रागिनी सारी।
वहीं पृष्ठों पर उतरी है पराजित यह व्यथा भारी।।
नयन की कोर पर आकर कोई अहसास सोता हो।
पराई पीर कर धारण कहीं मन जब यह रोता हो।।
दीया जब थाल में सज कर उतारें आरती तेरी
बजाए दुंदुभी वेला उषा की शंख भर भेरी
लगे जब छँट गया अंधियार तन का और इस मन का।
कोई नव मन्त्र पूरित अंगुलियों में देख कर मन का।।
अधूरा जाप पूरा हो निगत आवृत्ति यह फैले।
लगे फिर दृश्य के अवलम्ब नयनो के रचे मेले।।
बुझे निस्पंद प्राणों के जगे झंकार अनहद में।
जगा ब्रम्हांड का चेतन उतर आया है किस हद में।।
अगर गीली समिध मन की है तो बस धुआँ ही है।
अगर संकीर्णता की धार है प्यासा कुआँ ही है।।
तपन की आँच से कुंदन की पीली भित्तियाँ जागे।
तनिक सी अर्चियों के भास से फिर क्यो कोई भागे।।
न खोदो इस तरह माटी सभी दिनमान गहरे है
डॉ जय वैरागी
🐖🌹🐖🌹🐖🌹
मेरी नजर में.....
*तपन की आँच से कुंदन की पीली भित्तियां जागे।*
*तनिक सी अर्चियों के भास से ही क्यो कोई भागे।*
यह नव गीत नव सृजन का गीत है, संस्कार का गीत है, जीत की आधार का गीत है, अस्तित्व की स्वीकारोक्ति का गीत है, निष्प्राणों में प्राणों के संचार का गीत है और तमस से उजास की ओर ले जाता हुआ गीत है।
यह रचना कविता से अधिक सर्जना है। डर के आगे जीत है। डर की कोई हद है। अंग्रेजी में एक टेक्नीकल शब्द है "थ्रेशोल्ड" जिसका अर्थ है कि तमाम कायदे इस लिमिट तक है इसके बाद ये नियम निष्प्रभावी हो जाएँगे।
जैसे पर्वत शिखर तक पहुँचने के लिए चढ़ाई है फिर मैदान ही मैदान या उतार होता है। कुन्दन तपने से डरेगा तो निखार नही मिल सकेगा। संपूर्ण जीवन संघर्षों से भरा है। लोग संघर्ष को लड़ाई समझने की भूल कर लेते हैं। वस्तुतः वह अपने अस्तित्व को कायम रखने की जद्दोजहद है। दाना पानी की तलाश से डरने वाला पंछी नीड़ में बैठे बैठे मर जाता है। सुन्दर पंखों का स्वामी मुर्गा जीवन भर मैला खाता रहता है तो दूसरा साइबेरिया से जीवन और आनन्द की साहसी उड़ान भर यहाँ कर सफल हो कर लौट जाता है। जो डर गया समझो मर गया। जो आँच से डर गया वह साँच से डर गया। वस्तुतः तपन भी संस्कार है। संस्कार सज्जा तो है ही वह शोधन का सोपान भी है। सोने का पुराना आभूषण तपा कर गलाया जाता है तब लगता है यह प्रक्रिया विध्वंस है परन्तु वास्तव में यह एक नये स्वरूप, नये आकार, नई सज्जा की तैयारी है। और इसलिये तपन के अलावा कोई और रास्ता नही। यही संस्कार है। सोना सोना ही रहेगा संस्कारित हो कर निखर जावेगा।
चलो आग की तपन से मत डरो तपन को साधना बना लो। सृजन करो।
सृजन का तात्पर्य है संयोजन, संयोजन का आशय है चीजों को जोड़ना, जोड़ना एक कालबद्ध क्रिया। माली सींचे सौ घड़ा ऋतु आए फल होत। "इधर पौधे को पानी दिया और उधर फल तैयार" ऐसा कभी नही हो सकता। यही यह कविता की कहती है कि..
"कभी सींचा द्रुमों को आज उपवन छंद लगते है।
सिंचन सृजन की एक अभिक्रिया है आदमी के हाथ में बस यही है। काल स्वयं उसका सृष्टि उपक्रम करता है फिर तो बगीचे में जो घटित होगा वह छन्द की तरह गति, लय और ताल निबद्ध होगा। कथानक तो रंगमंच पर चल रहा घटनाक्रम है उसे सृषिकर्ता को समर्पित कर देना चाहिये क्योंकि वह उसका ही है। जो फल अर्थात् पारिणाम होगा वह मधुर होगा।
कथानक के समर्पण में मधुमय गन्ध लगते है।।"
"तस्मात्सर्वेषु कालेषु योगयुक्तो भवार्जुन।।गीता।।8/27।।"
कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन।।6.46।।
कर्म करने वालों से भी योगी श्रेष्ठ है, इसलिए हे अर्जुन तुम योगी बनो।।
इसलिए हे पार्थ! तू नित्य योगयुक्त हो जा। समय की गणना और सृजन की कालबद्ध क्रिया मुझ पर छोड़ दे। क्योंकि काल तो मैं स्वयं मैं ही हूँ। कालः कलयतामहम्।10.30।।
गणना करने वालों में काल हूँ।
कविता संवेदनाओं, भावनाओं और कर्मनिष्टा के माध्यम से प्राप्त की जाने वाली एक समग्र अभिक्रिया का संकेत करती है। इन तत्वों का संयोजन योग ही है। यह श्रेष्ठ मार्ग है।
नवगीत तो आज का है पर तत्वतः संस्कृति और संस्कार की प्रचुरता इसमें है।
रामनारायण सोनी
०५/०१/२०२०
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