एक कविता "मेहनत के फल" राजेश तिवारी "रामनगीना" की पुस्तक "कविता के झरनों पर" से।
रेत के मरुस्थल के सोए हुए ढेर में।
जोहना जल स्रोतों को मेहनत से मिलते हैं।।१
तलछटी चट्टानों को तोड़ने दो जोड़ से
मीठे पानी के झरने तो फोड़ कर निकलते हैं।।२
सूख कर कंकाल बने वृक्ष पर थी कोंपलें
फूटते अंकुर मिले बिना बात के भी खिलते हैं ।।३
अँधेरी सड़कों पर खड़ी पहाड़ हुई रातों को
मुसाफिर ने चीर दिए पथ लो दीप से पिघलते हैं।। ४
कहीं भी मिलती नहीं बयार ना आसान रास्ते पत्थरों में उगते फूल पगडंडियों पर मिलते है।।५
राजेश तिवारी "रामनगीना"
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मेरी नजर में:
रेत के मरुस्थल के सोए हुए ढेर में।
जोहना जल स्रोतों को मेहनत से मिलते हैं।।१
मरुस्थल का मूल अर्थ है वह स्थान जहाँ वर्षा बहुत कम होती है। दरअसल इसके अध्ययन वाले शोध पत्रों में इसे जल पात कहा जाता है। जरूरी नहीं कि वहाँ रेत के ढेर हों। परन्तु यह तय है कि वहाँ जल का अभाव है। जल कम है तो वनस्पतियाँ कम है, वनस्पतियाँ कम है तो मानव जीवन संधर्षों से भरा है। इन सोये हुए रेतों के टीलों के बीच कहीं कहीं ही जल के स्रोत हैं। खिसकते हुए रेत के टीलों पर घास व झाड़िया भी नहीं उग पाती। कविता इस माध्यम से संकेत करती है कि मेहनत करके रेगिस्तान में भी जीवन के आधार निर्माण किये जा सकते हैं।
तलछटी चट्टानों को तोड़ने दो जोड़ से
मीठे पानी के झरने तो फोड़ कर निकलते हैं।।२
चट्टानें दरारों पर से आसानी से टूटती हैं। इसमें दो अनुमान हैं एक तो सख्त चट्टानों को ठोस नही कमजोर जगहों पर प्रहार कर तोड़ा जाता है और दूसरा यह कि जल के स्रोत इन चट्टानों के पीछे छिपे पड़े हैं। श्रम का यही उपयुक्त तरीका है मेहनत कम और काम ज्यादा।
कहीं भी मिलती नहीं बयार ना आसान रास्ते पत्थरों में उगते फूल पगडंडियों पर मिलते है।।
इस बन्द में कविता एकदम खुला बोलती है। पत्थरों में खिले फूल देखना हो और शीतल मन्द सुगन्धित पवन चाहिये तो आसान सुगम रास्तों पर, राजपथ पर मत ढूँढना उसके लिये मेहनत करके ऊबड़ खाबड़ और टेढ़े मेढ़े रास्तों से गुजरना पड़ेगा। सीधे सीधे हस्तिनापुर नहीं मिलते पर मेहनत करके खाण्डवप्रस्थ को इन्द्रप्रस्थ बनाया जा सकता है।
पुस्तक का नाम इसी नेपथ्य से आया लगता है। झरने को झरना बनना है तो उसे अपनी ताकत और मेहनत से चट्टान के बीच से अपने स्वातन्त्र्य और जीवन के लिये रास्ते स्वयं बनाने होंगे अन्यथा वहाँ घुटन और सड़ाँध के अतिरिक्त कुछ और आशाएँ रखना व्यर्थ है। पेड़ों पर लगे फल तो वास्तव में मेहनत के फल हैं। जिन खेतों में मेहनत कर फसल नहीं उगाई जाती वहाँ केवल खरपतवार ही पैदा होते हैं। कविता श्रम के स्वेद कणों से मरूस्थल में जल और जीवन की तलाश करती है। राजपथ के सेंतमेंत में मिलने वाले सुखों को दरकिनार कर कर्मठता से जीवन को समृद्धशाली बनाना चाहती है। वेदों ने दूसरे के द्वारा कमाई सम्पत्ति को हथियाने वाले व्यक्ति को "दस्यु" कहा है। वस्तुतः इनकी कृति का नाम "कविता के झरनों पर" सार्थक लगता है। फिर इस कविता के इस बहते झरने से कवि भगीरथ बन कर श्रमसाध्य सफलता की स्रोतस्विनी गंगा लाना चाहता है।
रामनारायण सोनी
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