Sunday, January 2, 2022

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एक कविता डॉ रवीन्द्र नारायण पहलवान की "मैने तुम्हे" उनकी पुस्तक "एक शाम" से।

मैंने तुम्हें 

मैंने सोचा था, 
कभी कुछ बात कहूँ
कुछ बात करूँ तुमसे। 
तुम तो कभी नीचे नहीं आए 
मैंने सोचा 
चलूँ मैं ही, तुम्हारे पास। 

कितने सुन्दर हो तुम, 
सलोने भी कुछ कम नहीं, 
लो, मैंने तुम्हें छू लिया 
कितने कोमल हो तुम 
ओह, निराले, बादल।

 डॉ रवीन्द्र पहलवान
🌹🌷🌹🌷🌹🌷🌹

मेरी नजर में

कविता के पूर्वार्ध में यह लगता है कि एक व्यक्ति अपने किसी प्रिय के लिये बहुत अन्तरंग हो कर बात कहता है। एक परिसंवाद स्थापित करने की उसकी अदम्य इच्छा है। उत्तरार्थ में वह उसके सौंदर्य और सुकोमलता पर मुग्ध है। फिर उसने आहिश्ता से छू लिया। कविता की अन्तिम पंक्ति में पता चलता है वह प्रियतम तो बादल है। यह प्रकृति के अचेतन में चैतन्य का एहसास है। बहुत आश्चर्य जनक तादात्म्य है प्रकृति के साथ। इस पंक्ति में मानवीकरण और रूपक दोनों अलंकार होने से यह उभयालंकार का प्रयोग है। यहाँ प्रकृति में मानवीय गुणों और क्रियाओं का आरोपण किया गया है। बड़ी चतुराई से शब्दों की चित्रमयी भाषा का प्रयोग हुआ है। मेरी दृष्टि में कविता का सौंदर्य  काव्य की चित्रमयी भाषा है। इसी कारण शब्दों से चाक्षुक बिंब या दृश्य बिंब साकार हो उठा है। इससे सारा दृश्य हमारी आँखों के सामन घूम जाता है। इस तरह सौंदर्य वृद्धि हुई है पर इस मिले-जुले प्रभाव के कारण कविता का सौंदर्य और निखर आया है। 
यहाँ अमानव बादल में मानवीय व्यापार या क्रिया का आरोप हआ है। मानवीकरण अलंकार छायावादी कवि जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानन्दन पन्त, महादेवी वर्मा और निराला का प्रिय अलंकार है।
कविता का भावपक्ष बहुत महीन और स्निग्ध है वहीं यह कवि का अपनी प्रथम वायुयान की यात्रा के समय का स्वानुभव है। 
कविता में पदावली और संगीतात्मकता होने से गेयता का गुण आ गया है। पण्डित मोहन शर्मा ने इसे शास्त्रीयराग में  संगीतबद्ध किया और गाया है।
रामनारायण सोनी
२७/०३/२०२०

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