कभी कभी अतीत खुद आइना ले कर खड़ा हो जाता है, कहता है धूल भरे रास्ते से गुजरे साँप की लकीर जल्दी ही मिट जाती है पर पत्थर पर कुरेदे उकेरे निशान आसानी से नहीं मिटते। कहते हैं अखबार पर छपे नाम और रेखाएँ कागज के जलने के बाद भी देखे जा सकते हैं, रस्सी जल कर राख हो जाती है पर वे उमेठे राख में भी एक इतिहास ले कर खड़े होते हैं यानी राख हुआ कागज और रस्सी भी उन स्मृतियों को छोड़ने को राजी नहीं है। क्या मैं या तुम स्मृतियों छोड़ सकते हो? अचानक वक्त की हवा का झोंका आता है और राख के अणु अणु अन्तरिक्ष में बिखर कहीं विलीन हो जाते हैं। ये स्मृतियाँ मौन में, गहन शान्ति में, निस्तब्धता में अथवा अत्यन्त आकुल अवस्था में जीवन्त हो उठती हैं, ऐसी जैसे कि वे वर्तमान हो उठी हों। कभी तुम बुलाते हो तो कभी वे खुद साधिकार तुम्हारे मानस पर आकर बैठ जाती है। कभी लगता है कि शरीर यहाँ मिट्टी के लौंदे की तरह पड़ा है और तुम इतिहास की पुस्तक के उन पृष्ठों में जा कर खड़े हो जाते हो जहाँ रंगमंच की वही झाँकी सजीव हो उठती है। यादें अगर बचपन की हैं तो तुम उम्र और शरीर के चोले को उतार कर कहीं फेंक देते हो और वही सब जस का तस अनुभव करने लगते हो जो तब घटित हुआ था। प्रसंग प्रेम का हो तो तुम और धन्य हो जाते हो। बरबस उन्हें फिर फिर लौटा कर लाने लगते हो। तुम्हारी संवेदनाएँ, अनुभूतियाँ तुम्हें हटात् रोमांचित करने लगती हैं। इस मामले में सृष्टि के असंख्य जीवों से तुम बिल्कुल अलग हो। तुम भले ही कालजयी नहीं हो पर तुम जब जब चाहो, उस व्यतीत अतीत के दृष्टा बनने की क्षमता रखते हो।
वृजाङ्गनाएँ असह्य विरहाग्नि में जलते हुए भी स्मृतियों के विचित्र संसार में अलौकिक आनन्द का अमुभव करती हैं। लेकिन पाँच सितारा होटल के आलीशान ऐशो आराम के बीच अचानक आई कटु स्मृतियाँ हमें बेचैन कर सकती हैं। स्मृतियों का अपना अलग थलग संसार है। यह संसार हर एक का अपना है जैसे मुँह से कान सिला है। तुम्हारा तुम्हारे साथ और मेरा मेरे साथ लेकिन इसमें जब तुम आते हो तो तुम्हारा संसार मेरे साथ जुड़ा जुड़ा लगता है, मुझे तुम्हारा पता नहीं कि तुम्हारे साथ ऐसा होता है कि नहीं। मेरी स्मृतियाँ मुझसे कोई नहीं छीन सकता। तुम्हारे बारे में होते हुए भी तुम उसे वापस नहीं ले सकते। सच यह भी है कि क्या मैं तुम्हारी स्मृतियों से मिट सकता हूँ? नहीं ना ? क्योंकि वे शिलालेख हैं, समय के हस्ताक्षर हैं। क्योकि या "देवि सर्व भूतेषु स्मृति रूपेण संस्थिता।।"
स्मृतियाँ हमारे मानस की नैसर्गिक संरचनाएँ हैं। शास्त्र कहते हैं शरीर के मरने पर भी ये नहीं मरेंगी क्योंकि ये मन की भित्तियों पर लिखे अभिलेख हैं। जो साथ जाएँगे। मेरे भी, तुम्हारे भी।
रामनारायण सोनी
२३.०५.२२
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