Monday, July 25, 2022

भीतर बाहर का जगत

आदमी के पैदा होते ही उसका अपना एक संसार भी स्वतः पैदा हो जाता है एक बीज के अंकुरण की तरह। सबसे पहले रिश्तों के ढेर लग जाते हैं। समय के साथ साथ उसके जीवन की परिधियाँ बड़ी हाेने लगती है। शून्य से उठ कर वृहत् की ओर। चाहे कहीं भी चला जाय ये परिधियाँ उसे घेर कर चलती रहती है। यह विस्तार उसके अपने संसार का विस्तार है।

जो संसार तुम्हारे भीतर का है वही बाहर के संसार में विस्तार पावेगा। कलाकार की कृति पहले मानव के मन में जन्म लेती है फिर वह जो जो सृजन करता है वह सब डुप्लीकेशन, अनुकृति अथवा फोटो कापियाँ है। वास्तव में यह आदमी की कल्पना, आकांक्षाओं, ऐषणाओं और वृत्तियों का विस्तार है। उसकी अपनी वृत्तियों में बसी कल्पनाओं के स्पष्ट बिम्ब हैं, उन्हीं ने आकार लिया है। आधुनिक युग में जिसे फेन्टेसी कहा है वह एक पूर्ण काल्पनिक जगत की आभासी अवधारणा लेकर जन्मा विचार है जो कौतुहल के रूप में मस्तिष्क में आया है और फिर उसे साकार स्वरूप देने की कोशिश की जाती है। यह क्रिया का भौतिक स्वरूप है लेकिन वैचारिक क्रान्ति और आत्मबोध इसका आध्यात्मिक परिवेश तैयार करता है जो बहिर्यात्रा के बजाय हमें अन्तर्यात्रा के लिये प्रेरित करता है।

रामनारायण सोनी
२३.०७.२२

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