जानते हो ? बूढ़ा लाठी लेकर क्यों चलता है ?
वह लाठी को टेक टेक कर चलता रहता है और उस पर पूरा भरोसा भी करता है। मजे की बात यह है कि बूढा लाठी को लेकर चल रहा है न कि लाठी बूढे को ले कर चल रही है। पर उसे आभास होता है कि वह लाठी उसे हर खतरे से बचा कर अपनी मंजिल तक ले जाएगी, गिरने पड़ने से बचाएगी। उसी तरह जब नदी के पार जाना है तो मल्लाह और नाव दोनों पर भरोसा करना ही पड़ेगा। हवाई जहाज में बैठने से पहले पायलट और हवाई जहाज दोनों पर भरोसा करना ही पड़ेगा। ऑपरेशन टेबल पर पहुँचने के साथ ही डॉ और उसके हुनर-इल्म पर भरोसा करना होता ही है, इतना भरोसा कि अपने किसी भी सगे पर भी नहीं किया होगा।
यही दृढ़ विश्वास ले कर सद्गुरू के चरणों में खुद को और सारी समस्याओ को छोड दो नहीं तो भैया! गुरू को छोड दो। इतना पक्का भरोसा चाहिये सद्गुरु पर। एक बार भरोसा कर के देखो उसकी गुरुतापर, उसमें उपलब्ध गुरु सत्ता पर, उसकी उर्मियों में बसी चेतना पर। फिर हमने छोड़ा तो वह हमें पकड़े रहेगा क्योंकि गुरू एक व्यक्ति नहीं वह एक चेतन सत्ता है। जीव जब अपनी सुधि खोने लगता है तब तो गुरू का काम और महत्वपूर्ण हो जाता है। वही मार्ग और मंजिल तक ले जाता है। जैसे कि ईश्वर की सत्ता कभी प्रत्यक्ष नहीं दीखती पर धृति अथवा धर्म के रूप में सृष्टि का कण कण उसके कठोर अनुशासन में चलता है, चाहे जानो या अनजान ही बने रहो।
इसलिये भरोसा करो और चलो उसकी ओर वह हमें बुला रहा है। हमारे कल्याण के लिये।
"श्री सद्गुरुदेवाय नमः।।"
रामनारायण सोनी
14.07.22
No comments:
Post a Comment