Thursday, August 18, 2022

जरूरी क्या है?

क्या जरूरी है?
यह प्रश्न जीवन का विस्तार के लिये जरूरी है पर 'क्या क्या जरूरी है?' यह एक बड़ी वितृष्णा को जन्म देने वाला है। क्या जरूरी है? यह जीवन की आवश्यकता है पर आवश्यकता की परिधि को पार कर जाना मरुस्थल भागते हुए उस हिरन की तरह है जिसके नसीब में सिर्फ दौड़ है। वह दौड़ जो सिद्ध कर देगी कि तुमने प्यास बढ़ाई है, बुझाई नहीं। इस से तो अच्छा था तुम आवशयकता की उस परिधि के भीतर ही खड़े रहते। मरेरियलिज्म अर्थात् दुनिया का बाजार यह कहता है कि यह विचार तो मानव जाति का विकास रोकता है पर यह डिमान्ड एण्ड सप्लाय के सिद्धान्त को कहाँ मना करता है अतः आवश्यकता की आपूर्ति के लिये मनाही नहीं है। जब हमें पता है कि लास्ट रिक्वायरमेन्ट दो गज जमीन है तो फिर अन्धी दौड़ में हर कोई क्यों लगा है? प्रकृति का हर अंग न तो प्रतिस्पर्धा करता है न प्रतिघात। एक पेड़ न कभी नहीं चाहा कि बगल का पेड़ उससे ऊँचा न हो। बड़ी नदियाँ छोटी नदियों से कहती हैं आओ हम साथ मिल कर चलते हैं अपने उस गन्तव्य सागर की ओर। पवन कहती है खुशबुओं से चलो संसार को और सुगन्धमय बनाते हैं। सारे ग्रह उपग्रह अपने सूरज के परिवार में जुड़े है अपने अपने संयम से। कोई अतिक्रमण नहीं करता। पंछी आज सुबह उड़ेगा और उस के अपने संग कोई संग्रह नहीं होगा। अपनी भूख के अनुसार अपना पेट भरेगा।
हम न वक्त की चाल रोक सकते है, न शरीर की यात्रा और न ही जन्म और मृत्यु की आवृत्तियाँ ही। विज्ञान ने हमें सुख तो कई दिये हैं पर संतोश नही उल्टे हमें तेज और तेज दौड़ना सिखा दिया। जीवन तमाम आवश्यकताओं से भरा पड़ा है पर इसकी आपूर्ति के बीच संतोष तक सीमित रहे तो बेहतर होगा।
इदमद्य मया लब्धमिमं प्राप्स्ये मनोरथम्।
इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनर्धनम्।।16/13।। श्रीमद्भगवद्गीता।।
रामनारायण सोनी
१९.०८.२२

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