ये जो बार बार कोई कहता है न कि तुम्हारी सुन्दरता भीतर की होनी चाहिये। बाहर की सुन्दरता चाहे प्रकृति की हो चाहे आदमी की वह परिवर्तनशील है। यह बाहर भीतर आखिर है क्या? क्या कोई पैमाना है जो कुछ तुलना कर के बताया जा सके ? कई जगह पूछा तो कई तरह के उत्तर मिले।
एक दिन एक सहजी से पूछा उसने उत्तर तो नहीं दिया पर एक सरल सी बात कही। जो भीतर बाहर एक सा है वह सुन्दर है, जो व्यक्ति चीजों को अथवा जीवों को जैसा है उसको वैसा ही देखता है तो वह प्रकृति और परमात्मा का सौंदर्य ही देखता है। उसे अकेले फूल का सौंदर्य नहीं दिखाई देता अपितु उसे फूल और पत्थर दोनो में ही एक समान सौंदर्य दिखाई पड़ता है। उसे काँटे और गुलाब जैसे हैं वैसे ही एक बार में एक साथ सौंदर्य पूर्ण दिखाई देते हैं। बच्चा जब छोटा होता है तो वह भीतर बाहर एक सा होता है तो भीतर का अर्थात् आत्मा का सौंदर्य दिखाई पड़ता है। सूर्य का बाहर दिखाई देने वाला प्रकाश उसके भीतर से आता है। गुलाब की खुशबू उसके भीतर से आती है। वस्तुतः तुम्हारी आत्मा का सौंदर्य उसकी चेतना का विकीरण है।
रामनारायण सोनी
२३०८.२२
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