Thursday, August 3, 2023

च्यवनिका 6

च्यवनिका
#6

गुरू के पास चलो

दीपक जलता है तो उसके तले अँधेरा होता है, ऐसा लोग कहते हैं लेकिन इसका दूसरा पहलू बड़ा दिलचस्प है। दीपक अँधेरे में ही जलता है और जलते ही वह अपने चारों ओर का अँधेरा दूर करता है। जो कुछ थोढ़ा सा अँधेरा छूट जाता है उसे अपने नीचे रख लेता है। इसका प्रमाण यह है कि उसके बुझते ही छिपा पड़ा अँधेरा फिर चारों ओर फैल जाता है। 
अँधेरा जो पहले से ही मौजूद है वह दीपक के साहस का, दीपक के उत्सर्ग का, दीपक के परमार्थ का सम्मान करता है और जब तक दीपक जलता है वह उसके उजास से सँट कर खड़ा रहता है और मजे की बात यह है कि जब तक दीपक बुझ नहीं जाता वह दूर ही खड़ा रहता है। 
आशा प्रकाश है और निराशा अन्धकार। चिन्तन प्रकाश है और चिन्ता अँधेरा। सकारात्मकता प्रकाश का ही एक रूप है और नकारात्मकता अंधकार का। ज्ञान रोशनी का पर्याय है, अज्ञान अन्धकार का। सत्य प्रकाश का द्योतक है और असत्य अँधेरे का। हर व्यक्ति इसी अँधेरे और प्रकाश के बीच अपनी समस्त जीवन यात्रा पूर्ण करता है। जिनको प्रकाश के इस स्रोत का सही पता मालूम होता है वे इस स्रोत को गुरू कहते हैं। गुरू अज्ञान के अँधेरे में खड़े लोगों का बाहर निकालकर ज्ञान रूपी प्रकाश में लाकर खड़ा करने की क्षमता रखते हैं। जो उनके मन की अँधेरी कोठरी में ज्ञान का सूरज उगा सकते हैं, जो उनका हाथ पकड़कर उजियारे से सीधा परिचय करा सकते हैं। इसीलिये वेद कहता है कि "तमसो मा ज्योतिर्गमय" अर्थात अन्धकार से मुक्ति के लिए प्रकाश की ओर चलो। और इस ज्ञान-प्रकाश के लिये "वरान्निबोधत" अर्थात गुरू के पास जाओ।

रामनारायण सोनी
३.८.२३

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