च्यवनिका #9
इन पर्वतों को देखो इन पेड़-पौधों देखो, ये वनस्पति आदि को थाम कर वहीं के वही रुके हुए खड़े हैं, आदिकाल से। सागर को देखो वह चक्रवातों, तूफानों और ज्वारभाटों को अपनी अंक में समेटे अपनी सीमा खुद ही तय करके भी यह शान्त खड़ा है। सूरज स्वयं में निरन्तर विस्फोट झेलता है पर अपना मण्डल अर्थात् सौर परिवार को व्यवस्थित ले कर स्थिर है, अविचल है। और यह धरती ? इसे हमने धरती कह दिया पर शास्त्र इसे भू लोक कहता है। लोक अर्थात् एक सर्वांगीण व्यवस्था जो जीवन देती है, उसे पालती है और उपसंहार होने पर इसे आत्मसात् भी कर लेती है। इस लोक के प्रकट होने के पूर्व से ही इस धरा में मातृत्व प्रकट हो गया था। नदी, नाले, झीलें, सरोवर प्राणियों और प्रकृति लिये जल ले कर मुस्तैद खड़े हैं। हवा हजारों हजार अवरोधों के बावजूद प्राण और गन्ध ले कर निरन्तर चल रही है। देख सकते हो कि इसी प्रकार प्रकृति का प्रत्येक अंग स्वयं कष्ट में है फिर भी अपना धर्म कर्म कभी नहीं छोड़ता और परस्पर सदैव सेवा में रत है। हर कहीं कोई न कोई संकट चल रहा है इसके बावजूद सब चल रहा है।
हम भी थोड़ा विचार कर लें कि इनकी तरह हमारी अपनी जिजीविषा बनी हुई है कि नहीं?
रामनारायण सोनी
१०.०८.२३
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