च्यवनिका
#6
दर्पण का साक्षीभाव
एक दर्पण के पास अपना कुछ भी देने का नहीं है लेकिन उसे जैसे ही कोई बिम्ब मिला उसे वह पूर्ण रूप से लौटा देता है। रंगीन को रंगीन और रंगहीन को रंगहीन ही लौटाता है। रोते को रोता हुआ और हँसते को हँसता हुआ। एक खास बात और है कि गीली वस्तु का प्रतिबिम्ब गीला नहीं लौटाता है। वह केवल आकार ग्रहण करता है और वही लौटाता भी है। वह अपना कोई भी काम अँधेरे में किसी बिम्ब के सामने होते हुए भी वह कुछ नहीं कर पाता। उसे अपना काम करने के लिये उजाला चाहिये।
दर्पण कितनी ही कोशिश करे बिचारा मुखौटे के उस पार नहीं देख पाता है, काले चश्मे के पीछे की आँखों की नमी नहीं देख पाता है। आदमी की चालाकी को पढ़ नहीं पाता है।
चाँद भी एक बड़ा सा दर्पण है जो सूरज से आई रोशनी लौटाता है अगर ऐसा न हुआ होता तो धरती की रातें काली ही रहती। दर्पण और दर्पण बना चाँद बिम्ब को ले कर प्रतिबिम्ब लौटा देता है। पानी को देख कर गीला नहीं होता, आग को देख कर झुलसता नहीं। वह बिम्ब को एक क्षण भी अपने पास नहीं रख पाता। बिम्ब के हटते ही सब गायब।
दर्पण केवल साक्षी है, वह निर्लिप्त है विशुद्ध आत्मा की तरह। दर्पण से निकले प्रतिबिम्ब की तरह चेतना भी आत्मा की व्यापकता का ही स्वरूप है।
आत्मा साक्षी विभुः पूर्ण एको मुक्तश्चिदक्रियः ।
असङ्गो निःस्पृहः शान्तो भ्रमात्संसारवानिव ।।अष्टावक्र गीता १-१२।।
रामनारायण सोनी
6.8.23
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