लघु काल-चिन्तन १४
तुम्हारी यात्रा सीमित से विराट की ओर होनी चाहिये। ध्यान से सुनो! तुम्हारी अस्मिता स्वयं को एक पोखर से सागर की ओर चलने को कहती है। ध्यान दो! तुम्हारी चेतना विचारों और हौसलों की उड़ान भरने को कहती है। यह जो सृष्टि है न उस विराट की अद्भुत कृति है; यह स्वयं तुम्हें को आत्मानुभव में लाने को कहती है। अपने अन्तःकरण से यह अनुभव करो! यह उस सृष्टिकर्ता की सर्वहारा अनुकम्पा का बोध कराती है। देखो यह धरा तुम्हारा जीवन अपनी हथेलियों पर ले कर बैठी है। पवन का स्पन्दन महसूस करो जो हर पल तुम्हारा प्राण बन कर रग रग में दौड़ रहा है। जल से तुम तीन चौथाई भरे पड़े हो। यह जो अगन है न यह वैश्वानर है तुम्हारे भीतर की यज्ञशाला में निरन्तर जल रही है। यह आकाश सम्पूर्ण व्यष्टि और समष्टि को अपने उदर में भर कर बैठा है। इन तत्वों के भीतर और बाहर उस विराट के दर्शन करो! मनश्चक्षुओं से। इसे बाहर के नेत्र नहीं देख पाएँगे। तुम्हारी यात्रा का पहला कदम तुम्हें उठाना है फिर देखो! बाकी सम्पूर्ण यात्रा के लिये उस विराट ने अपनी गोदी फैला रखी है।
तुम्हारी यात्रा अनन्त है पर उस अनन्त की ओर दृष्टि जमी रहे।
"अपनी खोई हुई मधुर स्मृतियों को प्राप्त करो; परमात्मा और उसकी सृष्टि का स्पन्दन महसूस करो। आओ अभी से! चलोगे न?...तुम भी, हम भी, सभी साथ साथ।
रामनारायण सोनी
रे मन मीत!
जगत की जमीन
ऊसर नहीं है!
बोया सो उगा,
फला सो चुगा।
महज एकांगी
जीवन का पथ
लौट नहीं पायेगा
समय का गजरथ।
ऐसे में,
करेगा कौन मुक्त?
कोई और नहीं
केवल अपना मन
खोल दो साँकले अपनी
तुम्हें निर्बन्ध करेगा वह!
हाँ! केवल मन
रामनारायण सोनी
अर्चना पञ्च तत्वों की
तुम ही तो आधार हो
व्यष्टि के, समष्टि के, जीव के, जगत के
हे पवन !
ठहरी सी क्यों हो मलय की वीथियों में
चन्दन की सुगन्ध बाट जोह रही है तुम्हारी
इन्हें जन जन तक पहुँचा दो
प्राणवह, गन्धवह, वेगवाहिनी,
विश्व व्यापिनी, अमित बलवान हो तुम !
प्राणदा हो तुम!
हे जल!
तुम्हारी कल कल करती धाराओं को कहो !
प्रपातों से गिर कर धुआँ-धुआँ हो कर देखो !
इस निसर्ग को सौंदर्य से भर क्यों नहीं देती ?
भर दो नद -नदियों को अपने पावन जल से
इस दग्ध जीवन की प्यास मिटाने की सामर्थ्य है
केवल तुम में ही
कह दो इन्हे जगजीवन ले कर बहो ! .
हे दीप्त अग्नि!
ऋत्विज वेदियों को समिधाओं से
सज्जित कर प्रतिक्षा कर रहे हैं तुम्हारी ही
ऋचाएँ सर्वदिक् अनुनादित हो रही हैं
अपनी उत्तप्त जिव्हाओं में भर कर
पहुँचा दो आहुतियाँ देवों को
हे नचिकेत! हमारे भोज्य को
सुपाच्य और आरोग्यप्रद बनाओ!
हे मातृभूमि!
तुम पालक, धरित्री हो!
और जीवन दायिनी हो !
हम पर प्रसन्न हो कर हम पर अनुग्रह करो!
कृतार्थ करो हम पुत्रों को
हे असीम अम्बर!
इधर यहाँ भी, वहाँ भी हो तुम...
दिवस के प्रकाश में छोटे हो जाते हो
अँधेरे का उदय होते ही
तुम में उगती है अकाशगंगाएँ
और यहाँ...
इधर मेरे घर के कक्ष में
यह रात कहती है
हे दीपक! आओ
और मेरी एक कोने में
अपनी रोशनी लेकर बैठ जाओ
यहाँ किसी के मिलन की घड़ी आ रही है
साक्षी बनो उस महापर्व के
रामनारायण सोनी
१५/११/२२
महायोग:- मूलाधार से विशुद्धि तक
श्रीमद्भगवद्गीता
भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च।
अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा।।7/4।।
अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम्।
जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत्।।7/5।।
..:...
शब्द ब्रह्म
मैं शब्द हूँ
मैं उस अनन्त अक्षर से मण्डित हूँ
मैं अमर हूँ, मैं समर हूँ
मैं सुधा हूँ, मैं गरल हूँ
गूँज हूँ, अनुगूँज हूँ, स्पन्द हूँ
मैं वज्र भी हूँ, पुष्पों सा कोमल भी हूँ
नेपथ्य में बोये गए कुछ शब्द बीज
उगते, विकसते हैं जगत के रंगमंच पर
अपने अर्थ, भाव, संदेश और कथ्य ले कर
मेरी बिखरन होती है सतरंगी
रक्त सी लाल, सत्य सी श्वेत
निस्सीम व्योम सी नील,
पाण्डु सी पीत, राम-कृष्ण सी श्याम
वसन्त सी अभिराम,
लता सी हरित ललाम
जब जब मैं उतरता हूँ कोरे कागज पर
किसी के अन्तस से निकल कर
बाहर बिखरता हूँ साकार हो कर
बनाता हूँ चित्र, धँसता हूँ तुम्हारे भीतर
बैठ जाता हूँ शूल लेकर मन की कोंख में
चुभता हूँ, सालता हूँ कभी जीवन भर
लेप हूँ, मरहम हूँ, तसल्ली भी मैं ही तो हूँ।
मैं ओज का उद्घोष हूँ
शान्ति का दूत हूँ, स्मृतियों का महाकोष हूँ
प्रणय का गीत हूँ, प्रिय का मन मीत हूँ
पावन ऋचा हूँ, जीवन का उद्गीत हूँ
मैं नाद हूँ, मैं गीत हूँ, मैं प्रगीत हूँ
मैं माँ की ममता हूँ, पिता की गोद हूँ
आर्त की पुकार और वीरों में क्रोध हूँ
तुम्हारे मन में हूँ, आकाश में भी हूँ
चलता हूँ विद्युत की तरंगों पर
कभी हवा के परों पर बैठ कर
वहाँ सें यहाँ, यहाँ से वहाँ,
जाने कहाँ कहाँ
मैं बीज हूँ
सृजन भी मैं, जीवन भी मैं, ध्वंस भी हूँ मैं
मैं ब्रह्म हूँ। शब्द ब्रह्म।।
रामनारायण सोनी
२०.१२.२२
मैं दिव्य हूँ
बर्फ हो, पानी हो या हो वाष्प
अवस्थाएँ मेरी ही है
कहीं भी चला जाऊँ
ऊष्मा का संचरण हो
या ऊर्जा का अवक्षेप
मैं गलूँ या तपूँ
लौटूँगा पानी ही हो कर
क्योंकि मैं पानी ही हूँ
मैं दिव्य हूँ, परिपूर्ण हूँ, मौलिक हूँ
आत्मा की तरह
और आत्मा मेरी तरह
"तत्वमसि"
रामनारायण सोनी
१८.०२.२२
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