Friday, January 10, 2025

हाँ यह बनारस है

हाँ, यह बनारस है

इसे वाराणसी भी कहते हैं। वाराण याने जो वरेण्य है, श्रेष्ठ है। असी यानी वह स्थानीय नदी जो पतित पावनी गंगा में आ कर मिलती है। असी वह नदी है जिसके घाट पर बैठ कर रागी से विरागी हो कर बाबा तुलसी ने रामचरितमानस रची थी। रामचरितमानस वह नाम है जिसका नामकरण संस्कार कैलाश पर स्थित हो कर बाबा भोलेनाथ ने किया। कैलाश भी एक घाट है जहाँ बैठ कर जगदम्बा पार्वती ने बाबा के श्रीमुख से रामचरितमानस सुनी।
चलो फिर वाराणसी लौटते हैं। यहाँ सुरसरि गंगा प्रवाहित है। 
असी को ले कर चली ही थी कि एक और घाट आ गया। यह घाट मरघट है। वह मरघट जिसमें अमर-सत्यवादी राजा हरिश्चन्द्र ने चाण्डाल बन कर सेवाएँ दी। वह हरिश्चन्द्र जो अपने बेटे को खो कर आया था और तारा की साड़ी का आधा भाग मरघट के कर स्वरूप पाया था। इसी घाट पर तारा ने और हरिश्चन्द्र ने एक साथ अग्नि परीक्षाएँ दी थी, जहाँ रोहित तिरोहित हुआ था। सत्य और सत्यवादी दोनों तपे थे यहाँ फिर दोनों ही कुन्दन बने थे यहाँ। यही वह मरघट है जिसकी ज्वाला कभी नहीं बुझी। ये ज्वालाएँ साक्षी रही है मनुष्य के मर्त्य होने की, इतिहास की, भूगोल की, काल के चलते चक्र की और शेष अवशेष की।
यहाँ एक बार बाबा भोलेनाथ भी चाण्डाल बन कर आये और आचार्य शंकर को ब्रह्म का स्वरूप दर्शन करा गये। यह घाट तपे हुए जीव को तपाता है। मरे हुए को जलाता है। इन घाटों के पत्थर कभी मानस का अवतरण देखते हैं, कभी सन्त देखते है, कभी हरिश्चन्द्र देखते हैं तो कभी पार्थिव शरीर देखते हैं, इन शरीरों में से बची हुई राख देखते हैं। यह राख भी भागीरथी ही ढोती है, समुन्दर तक ले जाती है। 
यह वही बनारस है, वही गंगा है जिनके इन घाटों पर कभी कबीर उतरे, जिनकी धुनकी ने धुन धुन कर आदमी की खोट निकाल दी। चादर बुनते बुनते जो ब्रह्मानन्द को अपने कवित्त में बुन गया। उपनिषदों का अक्षुण्ण सत्य शब्दों के महीन, अटपटे-लटपटे सूत के धागों में पिरो गया। वह कबीर, वह तुलसी, वह रहीम जिनकी शब्दसरिता के धारे ऐसे बहे कि सारे जगत में वे भक्ति और ज्ञान के तीर्थ बन गये।
चलो उस पार जहाँ राजा रहीम रहता है। वह रहीम जो हमारे बीच जीवन के, ज्ञान के, व्यवहार के और भक्ति के रूप में बँटा। आज सामाजिक समरसता के लिये फिर प्रासंगिक हो गया है।
अजीब घाट हैं ये जिन पर जीवन के घट में भरने का अमृत भी मिलता है, सत्य का संधान करने के लिये कर्मयोगी भी मिलता है, मृत्यु के उपरान्त मनुष्य के पार्थिवत्व के दर्शन भी कराता है। यहाँ से थोड़ा सा ऊपर चढ़ें तो हमें वेद की पावन ऋचाओं की गूँज रही ध्वनियाँ सुनाई देंगी। यहाँ से संस्कृत, संस्कृति, संस्कार के अमरकोष निसृत होते हैं। यहाँ वाद के संवाद भी ज्ञानसागर का अमृतमंथन करते हैं, उनसे नवनीत निकालते हैं। यहाँ संघर्ष भी है, विमर्ष भी हैं अमर्ष भी हैं लेकिन इन सब से ऊपर संस्कृति का समग्र उत्कर्ष भी है। इसकी भूमि के कण कण ने भारत के जन जन में जागरण फूँका है। 
चलो वाराणसी की इस भूमि को, घाटों को, सन्तों को, विद्वज्जनों को, इसके पोषण करने वाले नगर वासियों को, पतित पावनी माँ गंगा को और विश्वनाथ को प्रणाम करते हैं। बनारस में रस बना रहे। वाराणसी श्रेष्ठ और विशिष्ठ बनी रहे। काशी तो मुक्ति का द्वार है। तीनों नाम जैसे अलकनन्दा, भागीरथी और गंगा है। वह भी त्रिपथगा है यह भी त्रिपथगा है। 

रामनारायण सोनी
११.१.२५

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