क्यों लिखे जा रहा हूँ मैं?
जब कोई पढ़ने वाला ही नहीं है
क्यों पढ़े जा रहा हूँ मैं?
जब कोई सुनने वाला ही नहीं है
क्यों लिखें ? क्यों पढ़े?, इन प्रश्नों के सागर में भी खड़े ये जिद्दी लोग मान क्यों नहीं रहे?
आखिर ये कौन लोग हैं जो उनसे नाता जोड़ रखे हैं जो वास्तव में उनके सगे हैं ही नहीं। क्यों उनका दुःख अपना समझ कर भारित हो रहे हैं? दु:खी हो रहे हैं? अच्छे को कोई भी अच्छा कह देगा पर इन्हें देखो तो सही, ये मरखने बैंलों के सींगों से डरे बगैर उन्हें लाल कपड़ा दिखाने से डरते नहीं। बड़े अजीब लोग हैं ये जो अपना धन, अपना तन और अपने चैन का अधिकृत समय जनता में लुटाये जा रहे हैं। क्या यह इनका पागलपन नहीं है? समाज में कोई जहर फैलाता है तो ये उसे पी कर नीलकंठ होना चाहते हैं, और उस जहर से बचने के नुस्खों की पुड़िया लिये फिरते हैं। अजीब से दरबान हैं ये जो खुद तो उनींदे खड़े हैं पर पौ फटते ही तुम्हें जगाने आ जाते हैं। न जाने क्यों इन्हें झोंपड़ियाँ, झुग्गियाँ, अन्धी गहरी गलियाँ, पसीने में लथपथ, बदबू और सीलन भरी बस्तियाँ पसन्द हैं जहाँ लोग जाना पसन्द नहीं करते। ये सनकी लोग वहाँ भी अपने कागज कलम ले कर खड़े हो जाते हैं। इन्हें कभी कभी अपच की बीमारी हो जाती है जो झूँठ को पचाने में असफल हो जाते हैं।
कौन से हैं ये खनिक लोग जो इतिहास, पुराण, शास्त्र को खोद/ शोध कर हीरे, माणिक लोगों के बीच बिखेर रहे हैं। शौकीन हैं ये लोग; इनके पास तलवार से तेज कलमें हैं जिसमें सिकलीगरों की तरह धार लगाते ही रहते हैं, मरहम सी मुलायम शाई है जिससे दुःख दर्दों पर पट्टियाँ बाँधने को तैयार हो जाते हैं।
ये वे ड्रोन हैं जो अपनी बैटरी खर्च कर के समाज के उत्सवों त्यौहारों, शोक सभाओं यहाँ तक कि मरघटों के सन्नाटों में वीडियोग्राफी करने पहुँच जाते हैं। इनके मस्तिष्क में कई तरह के कीड़े कुलबुलाते रहते हैं जो इन्हें चैन से बैठने ही नहीं देते।
हाँ ये सारस्वत पुत्र हैं ये, विरागी हैं ये, सन्यासी हैं ये, साधक हैं पुजारी हैं। समाज के लिये दर्पण बनाते हैं, सही रास्तों के संकेतक बनाते हैं, संहिताएँ रचते हैं जो जीवन की संचेतना हो सकती है। अपनी वेदी में, अपनी समिधा से, अपने घृत और अपनी आहुतियों से समाज के मंगल हेतु दिन रात हवन करते हैं।
रामनारायण सोनी
संक्रान्ति महापर्व दिनांक १४.१.२५
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