Tuesday, May 30, 2017

शिवसंकल्पमस्तु

येन कर्मण्यपसो मनीषिणो यज्ञे कृण्वन्ति विदथेषु धीराः ।
यदपूर्वं यक्षमन्तः प्रजानां तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु ।।

अन्वय

येन अपसः मनीषिणः यज्ञे धीराः विदथेषु कर्माणि कृण्वन्ति यत् अपूर्वं प्रजानां अंतः यक्षं तत् मे मनः शिवसंकल्पं अस्तु ।

अन्वयार्थ:-

(येन) जिस मन से (अपसः) पुरुषार्थी (धीराः)धीर और (मनीषिणः) मनस्वी या मननशील पुरुष (यज्ञे)अग्निहोत्र और (विदथेषु) युद्धादि अर्थात् वर्णानुकूल कर्म में भी (कर्माणि) इष्ट कर्मो को (कृण्वन्ति) करते हैं और (यत्) जो (अपूर्वम्) अपूर्व हैं और (प्रजानाम्) प्राणियों के (अन्त:) भीतर (यक्षम्) घुला-मिला हुआ हैं। (तत्) वह (में) मेरा (मनः) मन (शिवसंकल्पमस्तु) शिव संकल्पो वाला हो |
जिस मन से पुरुषार्थी अर्थात् कर्मनिष्ठ, धीर याने धैर्यवान, मनीषी याने मनस्वी लोग सत्कार्य करते हैं।

कर्मनिष्ठ कौन है-
यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन ।
कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते ॥ ३/७।।
भावार्थ : हे अर्जुन! जो मनुष्य मन के द्वारा इन्द्रियों को वश में करने का प्रयत्न करता है और बिना किसी आसक्ति के कर्म-योग का आचरण करता है, वही सभी मनुष्यों में अति-उत्तम मनुष्य है।
धीर पुरुष के गुण क्या हैं:-
समदुःखसुखः स्वस्थः समलोष्टाश्मकाञ्चनः।
तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः।।14.24।।

जो धीर मनुष्य सुखदुःखमें सम तथा अपने स्वरूपमें स्थित रहता है जो मिट्टीके ढेले, पत्थर और सोने के संग एक सा व्यवहार करता है जो प्रिय-अप्रिय में तथा अपनी निन्दा-स्तुतिमें सम रहता है जो मान-अपमानमें तथा मित्र-शत्रुके पक्षमें सम रहता है  वही धीर है।

मनीषी की क्या पहचान है:-
यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत्।
यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम्।।18.5।।
यज्ञ, दान और तप ये तीन प्रकार के कर्म त्यागने योग्य नहीं हैं अर्थात् इन तीनोंका त्याग करना उचित नहीं है इन्हें तो करना ही चाहिये क्योंकि यज्ञ, दान और तप ये तीनों मनीषियों को पवित्र करनेवाले हैं।

जिस मन से कर्मनिष्ठ एवं स्थिरमना प्रज्ञावान जन यज्ञ आदि कर्म और गंभीर व साहसी लोग विज्ञान आदि से संबद्ध कर्म सम्पादित करते हैं, जो अपूर्व है व सब के अंतःकरण में मिश्रित है अर्थात् मिला हुआ है, विद्यमान है, ऐसा हमारा मन शुभ-कल्याणकारी संकल्पों से युक्त हो !
।।।।

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