🔮आज का मौलिक चिन्तन🔮
🤔मौन से योग की ओर😴😑
मौन का अर्थ केवल "चुप रहना" ही नहीं है। विचारों का मन में चलते रहना भी मौन नहीं है। मौन से चिन्तन की ओर तथा योग की धारणा-ध्यान की ओर मुड़ना कितना जरूरी है, इसे ठीक से समझना होगा।
वाणी हमारे विचारों की अभिव्यक्ति है। वाणी के चार प्रकार है। परा, पश्यन्ती, मध्यमा, वैखरी। जो विचार हमारे मन में जन्मा वह बाहर आ कर तब नहीं पता चलता है जब तक अभिव्यक्त न हो जावे। अभिव्यक्ति के कई प्रकार हैं। जैसे बोल कर, शरीर के अंगों से इशारे कर के, कागज पर लिख कर, इत्यादि। विचार मन में आते हैं उनका अभिव्यक्त हो जाने का मतलब है हम अपने अन्दर को बाहर से जोड़ रहे हैं, जो भीतर चल रहा है उसे बाहर बता रहे हैं। बोलना अभिव्यक्ति का एक प्रकार है लेकिन यदि हमारा अन्तर किसी अन्य माध्यम से भी अभिव्यक्त हो गया तो जगत में उसकी क्रिया-प्रतिक्रिया प्रारंभ हो जाती है। यह उपक्रम जाने अनजाने में हमारे व्यवहार में चलता ही रहता है। अर्थात् यह जीवन का सहज क्रम और व्यवहार है। हाँ एक बात और संभव है कि जो विचार आये उन में से हम कुछ अभिव्यक्त करते हैं और कुछ को नहीं करते। विचार का उपजना और अभिव्यक्त हो जाना अप्रत्यक्ष रूप से हमारे अन्तःकरण का बाह्य जगत से जुड़ जाना ही तो है। विचार यदि किसी भी माध्यम से अभिव्यक्त नहीं हुए तो अन्तःकरण का निर्गम रुक जावेगा। विचारों की धारा का प्रवाह अन्तर्धारा के रूप में जारी रहेगा क्योंकि विचारों का जनक "मन" अभी भी पूरी तरह काम कर रहा होता है।
जो विचार अभिव्यक्त हुए हैं वे मन से ही निकले हैं इससे एक दम स्पष्ट है कि विचारों के माध्यम से मन ही अभिव्यक्त हुआ है। अगर बोलने के माध्यम से अभिव्यक्त हुआ है तो यह वाणी की वैखरी की स्थिति है। अगर बोला नहीं गया तो अभी अप्रकट रूप में वह परा आदि तीन स्थितियों में से किसी स्तर तक बैठा हुआ है।
इस स्थिति में विचारों की अन्तर्धारा का प्रवाहित होना ही चिन्तन है। मनुष्य के मानसिक विकास का विश्वकर्मा यहीं बसता है। हमें पता ही नहीं है कि हमारे या किसी भी व्यक्ति के समग्र व्यक्तित्व का निर्माण यहीं हुआ है। अलबत्ता विचारों की अन्तर्धाराएँ तो हो परन्तु अभिव्यक्ति की ओर न जाए तो वह श्रेष्ठ चिन्तन हो सकता है। चिन्तन के इस स्तर में मन नितान्त अकेला हो कर काम करता है। हमारा चिंतन जितना गहन और आदर्श होगा वही जीवन की दिशा-दशा तय करता है। हर वैज्ञानिक, दार्शनिक, राजनेता, प्रणेता, सद्गुरू या मनस्वी इस परिक्षेत्र का कुशल सृजक होता है।
विचार का मन में चलते रहना भी मौन की स्थिति नहीं है। मौन की स्थिति मन का पूर्ण रूप से विचार शून्य होना है। बाकी का हमारा समझा गया मौन अधूरा मौन है। विचार यदि अभिव्यक्ति तक नहीं पहुँचता है तो हम समझ लेते हैं कि हम मौन हैं। वस्तुतः "मौन की आदर्श स्थिति तो मन का विचार शून्य होना ही है"। देखा जाए तो विचार का जन्म मन से है परन्तु अभिव्यक्ति की ओर चलने से मौन समाप्त हो जाता है फिर चाहे वे बाहर आवें या न आवें। जो मौन से अभिव्यक्ति की इस प्रक्रिया को न समझ सका वह योगी नहीं हो सकता। योगी होने के लिए उसे पहले मौन का अभ्यास करना अत्यन्त जरूरी है। जिस प्रकार योग के लिये चित्त की वृत्तियों का निरोध होना जरूरी है उसी प्रकार चिन्तन के लिए मन की वृत्तियों का निरोध होना जरूरी है। यह बात अटपटी लगती है कि योग सिखाने वाले मन की वृत्तियों के निरोध से चालू न हो कर सीधे चित्त की वृत्तियों के निराेध में लग जाते हैं। जिसका मन अभी मौन नहीं हुआ वह योग क्या करेगा। मेरे मत में मौन के अभ्यास के बिना कोई भी किसी भी प्रकार का योगाभ्यास नहीं कर सकता। मौन की साधना तक ही हमारा प्रयास काम करता है आगे की प्रक्रिया मात्र अनुभूति है। बिना प्रयास के हम अनुभूति की अवस्था प्राप्त करना चाहते हैं जैसे कि कोई बीज बोए बगैर ही फसल काटना चाहता हो। हमको मन की वृत्तियों और शक्तियों को अच्छी तरह जान लेना चाहिए तभी उनका नियोजन किया जाना संभव है। मौन साधना से ही मन की शक्तियों में ऊर्जा का सिंचन हो पाना संभव है।
निवेदक
रामनारायण सोनी
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