Tuesday, May 30, 2017

एकांत, एकाग्रता अौर विचार


"एकांत, एकाग्रता अौर विचारों की निरन्तरता" चिन्तनीय है।
एकान्त:-
"एकान्त" से मतलब हम यह समझते है कि अकेला होना। वस्तुतः अकेला होना एकान्तिक होने से भिन्न है। अकेले होने का अर्थ है किसी का साथ न होना, लोगों से अलग थलग होना परन्तु ऐसा होने पर भी व्यक्ति जगत से जुड़ा रहता है, अपने मन के माध्यम से। वह शरीर से तो अकेला है पर उसके ख्याल उसे जगत से वैसे ही जोड़े रहते हैं। यह जुड़ाव उसे जगत से अभिन्न बनाए रखता है। उसकी संवेदनाएँ पूरी तरह उस वातावरण अथवा लोगों से जुड़ी रहती है जैसे वह उसके साथ हो कर महसूस करता है। इसे शरीर और मन की स्थितियों को साथ-साथ ले कर समझना होगा।
मनुष्य की दो भौतिक स्थितियाँ होती है- जागना और सोना। सोने की फिर दो स्थितियाँ होती हैं- एक स्वप्न देखते हुए और दूसरी बिना स्वप्न देखे प्रगाढ़ निद्रा पूर्ण। जागते हुए और स्वप्न देखते हुए वह जगत और बाह्य वातावरण की अनुभूति से वैसे ही जुड़ा रहता है जैसे वह जाग ही रहा हो। जैसे बारिश में भींगने की जागते हुए में जैसी अनुभूति होती है वैसी ही स्वप्न में भी बारिश में भींगने पर अनुभूति होती है। ये अभूतियाँ भीतरी है पर बाह्य जगत से व्यक्ति को अलग नहीं होने देती। ये अनुभूतियाँ मन करता है अर्थात् सोते-जागते में मन का जगत से जुड़े रहना उसे अकेला नहीं होने देता। साफ़ है कि शरीर से अकेले हो जाना एकांत नहीं है। एकान्त का मतलब अंत में एक होना या एक शेष रह जाना है। एक होने का मतलब है वह शेष नहीं अशेष रह जाए। जहाँ अनुभूतियाँ शून्य हो जाए अथवा अनुभूति करने वाला मन अग्राह्य हो जाए। वह प्रज्ञा में प्रतिष्ठित हो जाए। उपनिषद् इस स्थिति को सुषुप्ति कहता है। यहाँ वह स्थितप्रज्ञ हो जाता है। वह केवल वह रह जाता है। वास्तविक एकान्त यही है। यहाँ जाग्रत और स्वप्न अवस्था घनीभूत हो जाती है। न जगत समाप्त होता है, न शरीर समाप्त होता है, न मन समाप्त होता है। बस मन अमन हो जाता है। दूसरे शब्दों में, मन मौन हो जाता है। एकान्त यही है।

प्रस्तोता
रामनारायण सोनी

....क्रमशः

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