Tuesday, May 30, 2017

एकाग्रता

एकाग्रता का अभ्यास बनाम ध्यान 
अर्जुन के चित्त की यह दशा तब भी थी जब गीता का आरम्भ हुआ था। उस समय भी तर्क जाल का प्रयोग कर बिना एकाग्र चित्त हुए उसने श्रीकृष्ण के समक्ष अपनी युद्ध न करने की बात कह दी थी। अब पुनः वह प्रसंग सामने आने पर वह मन की चंचलता की बात कह रहा है। उसे आशा नहीं थी कि श्रीकृष्ण उसकी इस कमजोरी पर प्रहार करेंगे। किंतु जब आत्मसंयम योग के रूप में वह शिखर का दर्शन कर लेता है तो उसकी जिज्ञासा आरंभ हो जाती है। वह भी सकारात्मक ढंग से। यह एक शिष्य के लिए शुभ चिन्ह है। 
अर्जुन को मन की एकाग्रता का अभ्यास है। उसने निशाना लगाकर मछली की आँख बेधी थी और द्रौपदी को जीता था। उसने तेल के प्रवाह में गोल घूमती मछली की छवि मात्र देखकर अपना बाण चलाकर मन की एकाग्रता की चमत्कारी क्षमता का प्रदर्शन किया था, किंतु मन की एकाग्रता और तल्लीनता- तद्रूपता वाले वास्तविक योग में अंतर है। ध्यान योग सधता है पहले सचेतन मन की एकाग्रता से- इसके बाद उसे अचेतन मन पर केन्द्रित किया जाता है, ताकि वह चैतन्यवान- प्राणवान बन सके और इसके बाद सचेतन व अचेतन दोनों को जोड़कर सुपरचेतन- अतिचेतन की ओर आरोहण किया जाता है। तब ध्यान परिपूर्ण होता है। सचेतन मन की एकाग्रता को कई व्यक्ति साध लेते हैं। इससे आदमी के कर्म कुशलतापूर्वक होने लगते हैं। अर्जुन महावीर है- एकाग्रचित्त है पर ध्यान योगी नहीं, इसीलिए वह मन की चंचलता की बात बार बार कहता है। जब हम दूसरा कदम उठाते हैं- ‘‘फोकस इट आन अनकांशस्’’ अर्थात सचेतन को अचेतन पर केन्द्रित कर प्राणवान- सशक्त बनाना, तब हमें आंतरिक प्रसन्नता मिलती है। जब हम सुपरचेतन की ओर जाते हैं, तो हमें दिव्य रसानुभूति होने लगती है। कार्यकुशलता, प्रसन्नता, दिव्य रसानुभूति आत्मानुभूति- यह सभी ध्यान की फलश्रुतियाँ हैं। हमारा पात्र अर्जुन अभी एकाग्रता- कर्म कुशलता से भीतर नहीं जा पा रहा;क्योंकि चित्त की वृत्तियाँ उसे चंचल बना रही हैं। यदि यह यात्रा पूरी हो जाय, तो उसे योगेश्वर के अमृत वचनों की अनुभूति अपने अंदर होने लगेगी। 

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