Sunday, June 17, 2018

वेद हिमांशु

*जिंदगी के कैनवास पर*
*संवेदना के कवि चित्र*
             *वेद हिमांशु

रोजी रोटी के गणितीय समीकरण को पूरी शिद्दत और ईमानदारी से इस कृति के कृतिकार श्री रामनारायण सोनी ने सेवा निवृत्ति तक जिस सफलता से सुलझाया वह अक्षरशः यांत्रिक थी।
जी हां पैसे से इंजीनियर रहे श्री सोनी जी को ज्यादा वक्त नहीं हुआ काव्य अक्षरों के क्षेत्र में अपनी धमाकेदार उपस्थिति दर्ज कराते हुए। ये बात वह नि:संकोच और बड़ी विनम्रता से स्वीकारते भी हैं। हमारे लिए खुशी की बात भी है कि वे अब कविता की इंजीनियरी भी पूरी सफलता के साथ कर रहे हैं।
माफ कीजिए मैं इसे पूर्ण सत्य नहीं बल्कि अर्ध सत्य ही मानता हूं। भले ही उन्होंने अभी-अभी ही इस क्षेत्र में पदार्पण किया हो किंतु निखालिस सच यह है कि वे यांत्रिक नौकरी करते हुए भी एकांत की तनहाइयों में ही नहीं बल्कि, भीड़ भरे कोलाहल में भी जिंदगी के कैनवास पर संवेदना के भाव चित्र कविता की शक्ल में वह उकेरते रहे हैं और कवि रूप में हाल में हम सबके बीच प्रकट हुए हैं जिसका निस्संदेह स्वागत किया ही जाना चाहिए।
अतः मैं स्वागत क्या; अभिनंदन करता हूं श्री सोनी जी का
इस पूरे संकलन की कविताओं का यद्यपि मैंने आद्योपान्त अवलोकन/पठन किया है पर उनकी सूक्ष्म मीमांसा/व्याख्या करके मैं कविता के  संवेदनशील पाठकों के पहले अधिकार को नहीं छीनूँगा। आप इन कविताओं को, विविध रूपों की कविताओं को पढ़िए ही नहीं आनंद भी लीजिए और जिन्दगी के इस व्यापक कैनवास पर उकेरे गए काव्य चित्रों में रचे-बसे सुख-दु:ख के सहभागी भी बनिए।
पर हां मुझे इतना तो कहने दीजिए कि इस कृति की लगभग सभी कविताओं में जो निश्छलता और सादगी है वह जल्दी ही पाठक की उंगली पकड़कर अपने साथ चलने को विवश कर देती है। मेरे विचार में यही कविता की सबसे बड़ी पहचान है और खूबी भी।
इन कविताओं का रचयिता अपने स्वभाव में जैसी सादगी लिए है और जितना निर्मल, सरल और पारदर्शी है यही गुण उनकी रचनाओं में भी उतर आया है।
ये कविताएँ न तो दुरूह है न असंप्रेषणीय। वे न तो घुन्नी है ना ज्यादा वाचाल, न पांडित्य के बोझ से बोझिल, न अहम् ब्रह्मास्मि की तर्ज पर आत्म-मुग्ध।
जिस तरह मनुष्य का सामान्य जीवन विविधताओं का पिटारा है उसी तरह काव्य का स्वभाव भी रचयिता के स्वभाव से ही संचालित होता है।
हमारे आपके समय के वरिष्ठ कवि शिरोमणि नागार्जुन ने एक बार कहा था - "कोई भी आदमी सारा दिन गुस्से में नहीं रह सकता, वह सारा दिन रो भी नहीं सकता न ही सारे दिन हँस सकता है। वह यदि अन्याय के विरुद्ध लड़ता है तो भूख से पीड़ित भी होता है और खुशियों में प्रफुल्लित भी होता है।
कुल मिलाकर यह कि कोई भी मनुष्य (या रचनाकार) सदैव एक ही मानसिकता में नहीं जीता।
"जिन्दगी के कैनवास" कृति की इन विविधरूपी कविताओं को नागार्जुन की इस महत्वपूर्ण बात की कसौटी पर परखिए और बताइये कि मेरी बात कहाँ तक सही है।
हार्दिक अभिनंदन इस अवसर पर श्री सोनी जी को और यह शुभकामना कि "जीवेम शरद: शतम्" और इसके भी आगे बढ़कर "जीवेम काव्यः शरद: शतम्।"

शुभेच्छु
वेद हिमांशु

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